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मंगलवार, सितंबर 20

दंत कथा

दंत कथा 


दांतों तले उँगली दबाते, देख एआई  के कमाल 

आज मरने के बाद भी पूछा जाता है मृतक का, उसी से हाल

दांत काटे की रोटी खाते हैं जो, कभी अकेले नहीं रहते 

कोई जन  बात-बात पर दांत पीसने लगते   

कर दिए थे दांत खट्टे दुश्मनों के कारगिल में 

बजने लगे थे बेसाख़्ता दांत बर्फीले मौसम में 

कड़ी ठंड में भी आ गया था दुश्मन को दांतों  पसीना 

वरना कोई बत्तीसी निकाल हाथों  में धर देने की धमकी देता 

तो कोई बत्तीसी दिखाने पर झिड़कता 

दांत झलकाने पर ही कोई भलामानस बुरा मान जाता  

आनन-फ़ानन में दांत तोड़ने की धमकी दे देता   

दांत निपोर कोई दया की अर्ज़ी लगाता है 

दांत गिरते हैं, दांत झरते हैं गोया कि फूल हैं 

उनके दांतों की मिसाल दी जाती है 

दाड़िम के दानों से  

उपमा होती है कभी मोतियों से 

किसी के दांत गिनने में नहीं आते 

पता नहीं कौन सी चक्की का आटा हैं खाते 

मार्केट लुढ़क जाए तो  जम जाते हैं कितने दांत तालू में 

कोई दांतों से चबवाता है लोहे के चने 

कोई झेंपकर तो कोई बिना किसी लिहाज़ के दांत निपोरता 

कोई सेठ दांतों से कौड़ियाँ  पकड़ता  

कोई रह रह कर दांत किटकिटाता है

दांत गड़ाए है कोई परायी दौलत पर 

डटा हुआ है कोई दांतों को  जमाकर 

दांतों में जिव्हा की तरह रहता था विभीषण 

दूध के दांत टूटे भी नहीं कि आजकल 

बच्चे बड़ों को तकनीक सिखाते हैं 

आरसीटी कर  दांतों को चिकित्सक बचाते हैं 

बाहर निकले हुए दांत भीतर समाते हैं 

 बदल देते मुस्कान नए दांत भी लग जाते हैं 

इस तरह हिंदी में दांतों के मुहावरे नज़र आते हैं ! 

 


गुरुवार, मई 3

आया दांतों पसीना


आया दांतों पसीना


कल रात उन से मुलाकात हुई
कुछ बोध मिला कुछ बात हुई

अगर तन है मकान
तो रूप उसकी बैठक
सजा संवार रखते हैं बड़े जतन से जिसे
लगभग सभी इंसान..

आँखें झरोखे, दिल इबादतघर
अब सब घरों में तो होता नहीं
बड़ा.... सा.. पूजा घर
बहुत हुआ तो किसी आले में
या चलता है स्टोर घर...

फेफड़े, भीतरी खिड़कियाँ
धुएं से धुंधलाए जिनपर लगे शीशे
किसी किसी के.....  

पेट पाक शाला, जहाँ
बड़वाग्नि में पकता भोजन
वहाँ होती है
जिद्दी चिकनाई और ढेर सारा मसाला....

दर्द था दांत में सो हुआ यह मिलन   
न होता तो कहाँ उठती यह चिलमन
नजर भी नहीं आते दांत, जिनसे
जीवन भर सेवा हैं लेते
शुक्रिया एक दफा भी नहीं देते..

गर्म पेय या भोजन लिया मुख में
 सिहर जाता होगा इनेमल तब
इसकी परवाह करते हैं कब
झट से कोई कठोर वस्तु दबा ली
अनजाने उनकी जड़ हिला दी
मीठी चाय बहुत भाती  
पर शामत बेचारे दांतों की आती

ठंडागर्म लगने पर भी टाल ही जाते
अनसुनी कर देते हर गुहार
जब तक दर्द हद से न बढ़ जाये
और दम न तोड़ने लगे कोई दांत
दंत चिकित्सालय तक कदम नहीं बढ़ाये   
चिकित्सक झांकता जब भीतर
मुस्कुराते हुए सर उठाता है
उसे रोग के साथ
सुनहरा भविष्य जो नजर आता है...

दातों से यूँ हुईं कुछ बात
कट गयी सोते जागते रात...