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सोमवार, मार्च 23

वासंतिक नवरात्र आ गये

वासंतिक नवरात्र आ गये 


माँ के आने की बेला है 

घर में मंगल कलश बिठाओ,

धूप-दीप, फूलों से स्वागत  

 द्वारे बंदनवार सजाओ ! 


माँ जो भीतर कण-कण में हैं 

गहरी अंतर प्यास जगाओ, 

प्राणों का आधार वही हैं 

देवी माँ का ध्यान लगाओ ! 


क्षुधा रूप में, भक्ति रूप में 

शिव शक्ति और शांति रूप में, 

मन की बात कहे बिन सुनतीं 

माँ हैं दिल की गहराई में !


वही सप्त चक्रों में बैठी 

चिंतन, सृजन, प्रेम की देवी 

वही ज्ञान की देवी बनकर 

अंतर को सद्प्रेरित करतीं !


माँ के रूप हज़ारों चाहे 

मन में कोई रूप बसाओ, 

वह अनंत की राह दिखायें 

जीवन में समरसता लाओ !




 

गुरुवार, मई 22

देवी कवच

देवी कवच 


शैलपुत्री सी अडिग हो 

नित ब्रह्म में विचरण करे, 

चन्द्र ज्योति निनाद घंटा 

शुभ चेतना धारण करे !


स्कन्द जैसी वीरता हो 

कात्यायनी सी मधुर छवि, 

  कालरात्रि सी अति भीषण

गौरी माता सी हो द्युति !


सिद्धिदात्री हो प्रदाता 

चेतना पावन बनेगी,  

हर काल औ’ हर देश में 

सत्य का साधन बनेगी ! 


जगे प्राणशक्ति बन प्रबल 

उर भाव सारे शुद्ध हों, 

मन समर्पित हों हमारे 

सभी सर्वदा प्रबुद्ध हों !


हर दिशा में वह हमारा

मार्ग दर्शन मंगल करें,  

देवी कवच सी बन सदा  

नित भक्ति की रक्षा करें !


मंगलवार, अक्टूबर 25

दिवाली की अगली भोर

दिवाली की अगली भोर 


सूर्य ग्रहण लगने वाला है 

किंतु अभी है शेष  उजाला 

उन दीयों का 

जो बाले थे बीती रात 

जगमग हुईं थी राहें सारी 

गली-गली, हर कोना भू का 

चमक उठा था जिनकी प्रभा से 

ज्योति प्रेम की झलक रही थी 

आशा व विश्वास जगाती 

नयी भोर का 

भर लें मन में नीर कृपा का 

देवी माँ का उजला मुखड़ा

उठा वरद हस्त गणपति का 

कान्हा की मोहक मुस्कान 

हर आँगन में देव उतरते

सँग मानव के क्रीड़ा करते 

विमल प्रेम, उल्लास धरा पर 

युग-युग से लाते 

वे ही चमक हैं भारत माँ की 

देवों के सँग बातें दिल की 

गुरू ज्ञान भी 

अंधकार हर रहे मिटाता 

एक वर्ष फिर करें प्रतीक्षा 

युग-युग से यह पर्व अनोखा 

भर उमंग नव राह दिखाता !




बुधवार, अक्टूबर 6

देवी का आगमन सुशोभन


देवी का आगमन  सुशोभन 


देवी दुर्गा जय महेश्वरी 

 राजेश्वरी, मात जगदम्बा,  

आश्विन शुक्ल नवरात्रि शारद

अद्भुत उत्सव कालरात्रि का ! 


देवी का आगमन  सुशोभन 

उतना ही है भव्य प्रतिगमन,

जगह-जगह पंडाल सजे हैं

करते बाल, युवा सब नर्तन !


गूंजे घंटनाद व निनाद

सजे मार्ग, मंदिर कंगूरे,

शक्ति बिन शिव हों नहीं पूरे 

सृष्टि कार्य सब रहें अधूरे ! 


इच्छा, क्रिया, ज्ञान शक्ति तुम्हीं 

अन्नपूर्णा, विशालाक्षी,

कोटिसूर्य सम काँति धारिणी

शांतिस्वरूप, आद्याशक्ति !


विनाश किये मुंड और चंड,

ज्योतिर्मयी, जगतव्यापिनी,

कुंडलिनी शक्ति स्वरूपा माँ 

महिषा असुरमर्दिनी प्रचंड  !




रविवार, अक्टूबर 18

उस देवी की पूजा करें हम

उस देवी की पूजा करें हम  


थामती जो हर  विपद में 

 ज्ञान दीपक पथ दिखाती,

प्राण का आधार भी है 

  रात्रि बन विश्राम देती !


सौंदर्य देवी कहाए

जगत को आकार देती, 

शिव मिलन की प्रेरणा दे 

ले स्वयं कैलाश जाती !


ऊर्जा अपार धारे

अनंत का दर्शन कराती, 

 दात्री बनी सिद्धि रिद्धि

निःशंक जो सदा विचरती !

 

महातपस्विनी जगत मा 

पराम्बा,   महायोगिनी, 

शिव प्रिया,  माँ  महागौरी 

जगत तोषिणी व पोषिणी !