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गुरुवार, मई 22

देवी कवच

देवी कवच 


शैलपुत्री सी अडिग हो 

नित ब्रह्म में विचरण करे, 

चन्द्र ज्योति निनाद घंटा 

शुभ चेतना धारण करे !


स्कन्द जैसी वीरता हो 

कात्यायनी सी मधुर छवि, 

  कालरात्रि सी अति भीषण

गौरी माता सी हो द्युति !


सिद्धिदात्री हो प्रदाता 

चेतना पावन बनेगी,  

हर काल औ’ हर देश में 

सत्य का साधन बनेगी ! 


जगे प्राणशक्ति बन प्रबल 

उर भाव सारे शुद्ध हों, 

मन समर्पित हों हमारे 

सभी सर्वदा प्रबुद्ध हों !


हर दिशा में वह हमारा

मार्ग दर्शन मंगल करें,  

देवी कवच सी बन सदा  

नित भक्ति की रक्षा करें !


शुक्रवार, फ़रवरी 10

चुनाव

चुनाव 


शब्दों का एक जखीरा है वहाँ

हाँ , देखा है मैंने 

 ध्वनि एक,  जिससे उपजे शब्द अनेक 

एक  शै के भिन्न-भिन्न नाम 

उनमें से कुछ चुन लिए मैंने 

प्रेम, विश्वास और हंसी 

करते हुए शब्द ब्रह्म को प्रणाम 

शायद अनजाने में ही 

तुमने चुने होंगे 

युद्ध, सन्देह और पीड़ा 

तभी पनपी हैं दुःख की बेलें 

तुम्हारे आंगन में 

और यहाँ सुरभित फूलों की लताएँ !

सुवास से भरा है प्रांगण  

आँगन ही नहीं 

गली तक फैली है ख़ुशबू 

ऐसे ही कुछ देश चुन लेते हैं 

अपने लिए विकास और विश्वास 

और कुछ जाने किस भय में 

जिए जाते हैं खोकर हर आस ! 


गुरुवार, अगस्त 4

आज़ादी का अमृत महोत्सव

आज़ादी का अमृत महोत्सव 


सप्त  दशकों व पाँच वर्ष का  

सफ़र तय किया है भारत ने ? 

आदि सनातन संस्कृति अनुपम 

राह दिखायी जग को जिसने !


जूझा कभी ग़ुलामी से जो  

बन सामर्थ्यवान बलशाली, 

राष्ट्र स्मरण करता, जिन्होंने 

आज़ादी मशाल थी बाली !


वेदों की ऋचाएँ  गूंजी 

श्रद्धा, ज्ञान, योग  का  बल है, 

भारत भाल गर्व से दमके 

आदि काल से एक राष्ट्र है !


कालजयी परंपराएँ हैं 

विविधताओं में है एकत्व, 

सर्व में छुपा  ब्रह्म  देखता 

धर्म उदार भारत का तत्व !


अति समृद्ध इतिहास मनोरम 

साहित्य बहे विमल धार सा, 

गंगा, यमुना कावेरी ने,  

 इस भू को माँ बन संवारा !


वनवासी, जनजाति संस्कृति 

भारत के हर प्रांत को जोड़े, 

अंतर्निहित एकता पोषक 

कैसे कोई इसको तोड़े !


वेदों से यह नाम मिला है 

अजर  शाश्वत शुभ ज्योति स्वरूप, 

सह अस्तित्त्व सिखाता भारत 

जाने भेद यह छिपा अरूप !


रविवार, जनवरी 19

व्यक्ति या अभिव्यक्ति


व्यक्ति या अभिव्यक्ति 


अव्यक्त जब व्यक्त होता है शक्ति के साथ कहलाता है व्यक्ति और तब अहंकार का जन्म होता है सीमाएं बनती हैं जब व्यक्ति मात्र एक अभिव्यक्ति बन जाये उस अव्यक्त की तो जन्मता है मोक्ष टूट जाती हैं सारी सीमाएं ! पृथ्वी जब व्यक्त होती हैं देशों के माध्यम से तो युद्धों का जन्म स्वाभाविक है जैसे मानव ने गढ़ लिए हैं एक भूमि पर अनेक देश वैसे ही नहीं क्या एक ब्रह्म में अनेक जगत एक को जिसने पहचान लिया वह मुक्त हुआ वही भागीदार बना उस अनन्त सत्य का एकत्व का अनुभव किया वृक्षों, पर्वतों, गगन, अनल, पवन के संग एक में सबको, सबमें एक को देखो कृष्ण ने यही तो गाया है एक ही प्रेम, एक ही दर्द हर दिल में समाया है एक ही सत्य को अनेक रूपों में दर्शाया है हर बुद्ध ने इसी पथ पर चलाया है !

सोमवार, जुलाई 22

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आप सभी को शुभकामनायें

गुरु पूर्णिमा 

सदगुरु दूत खुदा का न्यारा
उसकी ओर ही करे इशारा I

जग को रब की खबर सुनाये
उस जैसा ही नेह लुटाए I

एक यही लाया पैगाम
कण-कण में व्यापा है राम I

साक्षी है वह परम ब्रह्म का
राज खोलता सृष्टि भ्रम का I

सदगुरु जीवन का संगीत
पोर-पोर से गाये गीत I

सबका पल पल रखता ध्यान
सदा सभी को अपना मान I

सदगुरु दूर करे अज्ञान
प्रेम भरे मिटा अभिमान I

सदगुरु शिखरों पर ले जाये
मन को सुंदर पंख लगाये I

जैसे एक अलौकिक घटना
सदगुरु सुंदर सच्चा सपना I

दूर करे हर चिंता मन की

पकड़ा दे मस्ती जीवन की I

सोमवार, फ़रवरी 25

जीवन दो का है खेल सदा


जीवन दो का है खेल सदा


खिलते काँटों संग पुष्प यहाँ
है धूप जहाँ होगी छाया,
हत्यारा गर तो संत भी है
है ब्रह्म जहाँ होगी माया !

हो तिमिर सघन, घनघोर घटा
रवि किरणें कहीं संवरती हैं,
जो आज चुनौती बन आयी
कल बदली बनी बरसती है !

जीवन दो का है खेल सदा
हर क्षण में दूजा मरण छिपा,
इक श्वास जो भीतर भर जाती
बाहर जाती ले रही विदा !

जो पार हुआ तकता दो को
वह खेल समझता है जग का,
इस ऊंच-नीच के झूले से
वह कूद उतरता खा झटका !  

है शुभ के भीतर छिपा अशुभ
शत्रु बन जाते मित्र घने,
न स्वीकारा जिसने सच यह
विपदा के बादल रहे तने !

सुख की जो बेल उगाई थी
कटु फल दुःख के लगते उस पर,
जीवन में छिपा मरण पल-पल
मन करता गर्व यहाँ किस पर !