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गुरुवार, मई 22

देवी कवच

देवी कवच 


शैलपुत्री सी अडिग हो 

नित ब्रह्म में विचरण करे, 

चन्द्र ज्योति निनाद घंटा 

शुभ चेतना धारण करे !


स्कन्द जैसी वीरता हो 

कात्यायनी सी मधुर छवि, 

  कालरात्रि सी अति भीषण

गौरी माता सी हो द्युति !


सिद्धिदात्री हो प्रदाता 

चेतना पावन बनेगी,  

हर काल औ’ हर देश में 

सत्य का साधन बनेगी ! 


जगे प्राणशक्ति बन प्रबल 

उर भाव सारे शुद्ध हों, 

मन समर्पित हों हमारे 

सभी सर्वदा प्रबुद्ध हों !


हर दिशा में वह हमारा

मार्ग दर्शन मंगल करें,  

देवी कवच सी बन सदा  

नित भक्ति की रक्षा करें !


गुरुवार, सितंबर 20

शब्दों की सीमा बाहर है



शब्दों की सीमा बाहर है


शब्दों से ही परिचय मिलता
उसके पार न जाता कोई,
शब्दों की इक आड़ बना ली
कहाँ कभी मिल पाता कोई !

ऊपर ऊपर यूँ लगता है
शब्द हमें आपस में जोड़ें,
किन्तु कवच सा पहना इनको
बाहर ही बाहर रुख मोड़ें !

भीतर सभी अकेले जग में
खुद ही खुद से बातें करते,
एक दुर्ग शब्दों का गढ़ के
बैठ वहीं से घातें करते !

खुद से ही तो लड़ते रहते
खुद को ही तो घायल करते,
खुद को सम्बन्धों में पाके
खुद से ही तो दूर भागते !

हो निशब्द में जिस पल अंतर
एक ऊष्मा जग जाती है,
दूजे के भी पार हुई जो
उसकी खबर लिए आती है !

दिल से दिल की बात भी यहाँ
उसी मौन में घट जाती है,
शब्दों की सीमा बाहर है
भीतर पीड़ा छंट जाती है !

कोरे शब्दों से न होगा
मौन छुपा हो भीतर जिनमें,
वे ही वार करेंगे दिल पर
सन्नाटा उग आया जिनमें !