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शनिवार, मई 30

जन्मदिन की कविता

जन्मदिन की कविता 


हे अनाम ! तुझे प्रणाम 
जाने किस युग में आरम्भ हुई होगी यह यात्रा 
या अनादि है यह भी तेरी तरह 
कभी पत्थर, पौधा, जलचर, नभचर या थलचर बनते-बनते 
 मिला होगा अन्ततः यह मानव तन 
फिर इस तन की यात्रा में भी 
कभी राजा, कभी रंक 
कभी स्त्री कभी पुरुष 
कभी अशिक्षित कभी विद्वान् 
अनेक धर्मों, आश्रमों, वर्णों 
में लिए होंगे जन्म 
गढ़ते-गढ़ते इतने काल से 
इतने दीर्घ कालखण्ड में 
आज जो बन गया है मन  
वह जानता है कि
अब मंजिल निकट है 
देख लिए सारे खेल 
देख ली तेरी माया 
यकीनन इसने बहुत लुभाया 
नाजुक रिश्तों के मजबूत बन्धनों में बाँधा 
सुख-दुःख के हाथों से बहुत राँधा
अहंकार की भट्टी में तपाया 
कल्पनाओं के झूले में झुलाया 
पर अब जाकर तेरा मर्म कुछ-कुछ समझ में आने लगा है 
अब खत्म हुई यह दौड़ 
अब घर याद आने लगा है 
जन्म-मृत्यु के इस चक्र से जब कोई छूट जाता है 
फिर जब मौज होगी तो फिर आता है 
पर तब कैदी नहीं होता प्रारब्ध का 
तेरी तरह बस
 मुस्कानें बिखेरता और गीत गाता है !

शनिवार, अक्टूबर 13

नहीं अचानक मरता कोई


नहीं अचानक मरता कोई


नव अंकुर ने खोली पलकें
घटा मरण जिस घड़ी बीज का,
अंकुर भी तब लुप्त हुआ था
अस्तित्त्व में आया पौधा !

मृत्यु हुई जब उस पौधे की
वृक्ष बना नव पल्लव न्यारे,
यौवन जब वृक्ष पर छाया
कलिकाएँ, पुष्प तब धारे !

किन्तु काल न थमता पल भर
वृक्ष को भी इक दिन जाना है,
देकर बीज जहां को अपना
पुनः धरा पर ही आना है !

नहीं अचानक मरता कोई
जीवन मृत्यु साथ गुंथे हैं,
पल-पल नव जीवन मिलता है
पल-पल हम थोड़ा मरते हैं !

शिशु गया, बालक जन्मा था
यौवन आता, गया किशोर
यौवन भी मृत हो जायेगा
मानव हो जाता जब प्रौढ़ !

वृद्ध को जन्म मिलेगा जिस पल
कहीं प्रौढता खो जायेगी,
नहीं टिकेगी वृद्धावस्था
इक दिन वह भी सो जायेगी

पुनः शिशु बन जग में आये
एक चक्र चलता ही रहता,
युगों-युगों से आते जाते
जीवन का झरना यह बहता !

मंगलवार, जनवरी 17

बीज से फूल तक


बीज से फूल तक


कृषि भवन के विशाल कक्ष में
शीशे के जार में बंद एक नन्हा सा बीज
था व्याकुल बाहर आने को
नयी यात्रा पर जाने को....
खरीदने की मंशा लेकर तभी आया एक किसान
तैयार थी माटी, रोपा गया वह बीज उसी शाम
तृप्त हुआ था बीज
 पाकर सिंचन
और ऊष्मा धरा की
उठने को आतुर था
गगन और पवन के सान्निध्य में
मर मिटने को था वह तैयार
मिलाने पंच भूतों की काया पंच भूतों से
पर नहीं था तैयार उसका खोल
जो आज तक था रक्षक
बना था बाधक
कांप उठा वह
क्या इस बार भी
भीतर ही भीतर सूख जायेगा
नन्हा सा अंकुर
नहीं... पुनः नहीं
जाना ही होगा इस खोल को
ताकि एक दिन फूल बनने की
 सम्भावना को तलाश सके बीज
एक नयी पीढ़ी को सौंप जाये अपनी विरासत
पूरी शक्ति से भेद डाला आवरण
आ ऊपर धरा के ली दीर्घ श्वास
अभी लंबी यात्रा तय करनी है
कितने मौसमों की मार सहनी है
कितनी हवाओं से सरगोशियाँ
तितली, भंवरों से
गुफ्तगू करनी है
वह उत्सुक है जीवन को एक बार फिर जीने के लिए
उत्सुक है हवा, जल और ऊष्मा को पीने के लिये   
 फूल बन कर अस्तित्त्व के चरणों में समर्पित होने के लिए
कैसा होगा वह पल जब
अपना सौंदर्य और सुरभि सौंप
बच जायेगा यह बीज उन हजार बीजों में
अस्तित्त्व भी प्रतीक्षा रत है
बनने साक्षी उस घड़ी का...