दर्पण सा खाली रहता है
शब्द कहाँ वह कह पाएंगे
हर पल जो अस्तित्व गा रहा,
पत्ता-पत्ता, कण-कण भू का
भर-भर जो भी दिए जा रहा !
अंकुर फूटा कोख धरा की
देखो कैसे बढ़ता पादप,
माटी रूप बदलती कितने
रस, गंध की झरती गागर !
दर्पण सा खाली रहता है
लाखों रूप नाम गढ़ जाता,
जीवन रस प्रतिक्षण बहता है
कभी स्रोत न होता रीता !
उसी मौन में जग जाये जो
हर सलीब उतर जाती है,
किरणों के संग जगता सोता
नव चन्द्रिमाँ झर जाती है !
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