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सोमवार, अगस्त 4

दर्पण सा खाली रहता है



दर्पण सा खाली रहता है



शब्द कहाँ वह कह पाएंगे
हर पल जो अस्तित्व गा रहा,
पत्ता-पत्ता, कण-कण भू का
भर-भर जो भी दिए जा रहा !

अंकुर फूटा कोख धरा की
देखो कैसे बढ़ता पादप,
माटी रूप बदलती कितने
रस, गंध की झरती गागर !

दर्पण सा खाली रहता है
लाखों रूप नाम गढ़ जाता,
जीवन रस प्रतिक्षण बहता है
कभी स्रोत न होता रीता !

उसी मौन में जग जाये जो
हर सलीब उतर जाती है,
किरणों के संग जगता सोता
नव चन्द्रिमाँ झर जाती है !



शनिवार, अक्टूबर 13

नहीं अचानक मरता कोई


नहीं अचानक मरता कोई


नव अंकुर ने खोली पलकें
घटा मरण जिस घड़ी बीज का,
अंकुर भी तब लुप्त हुआ था
अस्तित्त्व में आया पौधा !

मृत्यु हुई जब उस पौधे की
वृक्ष बना नव पल्लव न्यारे,
यौवन जब वृक्ष पर छाया
कलिकाएँ, पुष्प तब धारे !

किन्तु काल न थमता पल भर
वृक्ष को भी इक दिन जाना है,
देकर बीज जहां को अपना
पुनः धरा पर ही आना है !

नहीं अचानक मरता कोई
जीवन मृत्यु साथ गुंथे हैं,
पल-पल नव जीवन मिलता है
पल-पल हम थोड़ा मरते हैं !

शिशु गया, बालक जन्मा था
यौवन आता, गया किशोर
यौवन भी मृत हो जायेगा
मानव हो जाता जब प्रौढ़ !

वृद्ध को जन्म मिलेगा जिस पल
कहीं प्रौढता खो जायेगी,
नहीं टिकेगी वृद्धावस्था
इक दिन वह भी सो जायेगी

पुनः शिशु बन जग में आये
एक चक्र चलता ही रहता,
युगों-युगों से आते जाते
जीवन का झरना यह बहता !