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शुक्रवार, जुलाई 15

यह पल

यह पल 


जो अनंतानंत ब्रह्माडों का स्वामी है 

वही भीतर ‘मैं’ होकर बैठा है 

 एक होकर मानो दो में बंट गया है 

समय अखंड है, अखंड है चेतना

जैसे जीवन अखंड है 

जन्म-मृत्यु, प्रकाश-छाया, 

जगत-जगदीश्वर  

भेद सारे माया ने दिखाए !

हर नया पल बन सकता है बीज 

आने वाले हजार पलों का जन्मदाता 

यदि जाग जाये कोई इस पल में 

तो धीरे से वह अनंत मन को छू जाता 

न जाने किस श्वास में 

वर्तमान का एक पल

प्रेम की डाली से झरे फूल की तरह 

भर जाये विश्वास की सुवास 

या सीप में गिरी 

मोती बनने को उत्सुक बूँद की तरह 

छू जाए अंतर का आकाश !

रविवार, जनवरी 2

खोया नहीं है जो

खोया नहीं है जो 

खोया नहीं है जो 

खोया हुआ सा लगता है 

जैसे शशि झील में 

सोया हुआ सा लगता है 

न ही दूर गया उससे 

न  जा सकता है बाहर 

कोई बीज धरा की गहराई में जैसे 

बोया हुआ सा लगता है 

प्रीत का जल, ऊष्मा उर की

जब जब बहती है 

 उस पल कोई मीत 

आया हुआ सा लगता है 

जो श्वासों में है 

बसता दिल की धड़कन में भी 

कैसे भला  नज़र हटे 

जिसके बिना नहीं अंतर 

धोया हुआ सा लगता है !


मंगलवार, मई 4

चेतन भीतर जो सोया है

चेतन भीतर जो सोया है


बीज आवरण को ज्यों भेदे  

धरती को भेदे ज्यों अंकुर, 

चेतन भीतर जो सोया है 

पुष्पित होने को है आतुर !


चट्टानों को काट उमड़ती 

पाहन को तोड़ती जल धार,

नदिया बहती ही जाती है 

रत्नाकर से है गहरा प्यार !


ऐसे ही भीतर कोई है 

युगों-युगों से बाट जोहता,

मुक्त गगन का आकांक्षी जो  

उसका रस्ता कौन रोकता !


धरा विरोध करे ना कोई 

पोषण देकर उसे जिलाती, 

अंकुर को बढ़ने देती है

लिए मंजिलों तक फिर जाती  


चट्टानें भी झुक जाती हैं 

मिटने को तत्पर जो सहर्ष, 

राह बनातीं, सीढ़ी बनतीं 

नहीं धारें तिल मात्र अमर्ष !


लेकिन हम ऐसे दीवाने 

स्वयं के ही खिलाफ खड़े हैं, 

अपनी ही मंजिल के पथ में 

बन के बाधा सदा अड़े हैं !  


जड़ पर बस चलता चेतन का 

मन जड़ होने से है डरता,

पल भर यदि निष्क्रिय हो बैठे 

चेतन भीतर से पुकारता !


लेकिन मन को क्षोभ सताए  

अपना आसन क्यों कर त्यागे, 

जन्मों से जो सोता आया 

कैसे आसानी से जागे !


दीवाना मन समझ न पाए 

जिसको बाहर टोह रहा है, 

भीतर बैठा वह प्रियतम भी 

उसका रस्ता जोह रहा है ! 

 

शुक्रवार, दिसंबर 18

बीज एक यात्रा

बीज एक यात्रा 
सुबह बीज है
जिस पर दिन का फल लगता है
ऐसे ही जैसे शैशव बीज से
जीवन लता फैलती है
वर्तमान है वह बीज
जिसमें भावी विशाल वटवृक्ष छिपा है
सुबह यदि खो गयी
तंद्रा-अलस में डूबी
तो दिन उखड़ा-उखड़ा सा रहेगा
अधूरापन सताएगा
शैशव को नहीं  संभाला गया
कोमल किन्तु सुदृढ़ हाथों से
न हुआ संस्कारित तो जीवन दिशाहीन हो
इसमें अचरज  ही कैसा  ?
बच्चे जो पलते हैं सड़कों पर
कठोर होता है बचपन जिनका
क्या बदल नहीं जाएंगे उद्दंड युवा और उदास वयस्कों में
वर्तमान के बीज से ही भावी पनपता है
यदि आज हो रहा है तृप्ति का अहसास सार्थक कृत्यों द्वारा
तभी कल बाहें फैलाए मिलेगा
कर्मशील है अब तो कल भी हाथ काम करते-करते ही विदा लेंगे
वर्तमान मनु है तो भविष्य देव
आज पुरुषार्थ है तो भावी प्रारब्ध
जैसा दिन होगा रात होगी वैसी
ऊर्जा से भरा दिवस ही विश्राम से भरी रात्रि का जनक है !

शुक्रवार, दिसंबर 4

लहराएगा मुक्त गगन में

लहराएगा मुक्त गगन में


अभी खोल में ढका बीज है 
अभी बंद है उसकी दुनिया, 
उर्वर कोमल माटी  पाकर 
इक दिन सुंदर वृक्ष बनेगा !

जल से निर्मल भरे ताजगी
धरती से गर्माहट उर में, 
नृत्य पवन से भर-भर पल्लव  
लहराएगा मुक्त गगन में !

शाखाओं पर पंछी आकर 
बैठेंगे मृदु गान सुनाने,
फूलों के खिलने की आशा 
उस पादप के मन अंकुराने !

वही बीज फिर फूल बना नव
खिल जाएगा रूपरंग में, 
भँवरे तितली कीट अनेकों 
गुनगुन गाकर उसे रिझाएं 

मिलन घटेगा अस्तित्व से 
फल बनकर फिर बीज धरेगा, 
जहाँ से आ क्रीड़ा रची यह 
उस भू में रोपा जाएगा !

छुपा बीज में राज सृष्टि का 
खिलकर मुक्त हास जो बांटे, 
तृप्त हुआ वह उर मुस्काता 
सहज गुजर जाता इस जग से !

शुक्रवार, सितंबर 11

रह जाता वह मुस्का कर

रह जाता वह मुस्का कर


स्मृतियों के अंबार तले यह 

दीवाना सा मन पिसता है, 

जन्मों-जन्मों जो बीज गिरे 

उन फसलों में अब घिरता है !


दिन भर जतन से साधा इसको 

स्वप्नों में सभी भूल गया, 

निद्रा देवी के अंचल में 

विश्राम मिला ना शूल गया !


दिवस रात्रि यह खेल चल रहा 

कोई देखे जाता भीतर, 

जिन भूलों पर झुँझलाता उर  

बस रह जाता वह मुस्का कर !


लक्ष्य बाहरी लगते धूमिल 

यही जागने की बेला है,

चौराहे पर बाट जोहती 

मृत्यु, शेष रही नहीं मंजिल !


अब तो द्वार खुले अनंत का 

मन में गूँजे बंसी की धुन, 

चाहों के जंगल अर्घट हों 

रस्ता दें झरनों को पाहन !



 

शनिवार, मई 16

शब्द बीज


शब्द बीज

भीतर कहीं शब्दों के बीज गिरे थे 
कुछ प्रिय और कुछ अप्रिय शब्दों के बीज 
जिनसे उगते रहते हैं नए- नए शब्द 
फिर वे बुन लेते हैं एक अदृश्य जाल
संस्कृति और सभ्यता ने सौंपे कुछ शब्द 
माता-पिता, समाज, किताबों से मिले 
चन्द भारी शब्द बो दिए जाते हैं 
बालक के मन में 
जीवन भर जिनकी फसल काटता रहता है वह
भाषा साधन है तो उसका दुरुपयोग भी बहुत हुआ है 
शब्दों ने मानव की आत्मा को ढक लिया है 
वह प्रकट होना चाहती है 
पर कोई न कोई पहरे पर खड़ा है 
जीवन हर बार किसी शब्द से टकराकर 
औंधे मुँह पड़ा  है !

बुधवार, जनवरी 22

समाधि का फूल

समाधि का फूल

“जब गिर जाएगी झूठ की आखिरी दीवार भी भीतर 
सुडौल हो जायेगा भावनाओं का नुकीला पत्थर घिसते-घिसते 
जो चुभ जाता था खुद को और चुभाया जाता था दूसरों को 
जब तृप्त हो जाएगी मन की आखिरी वासना भी 
जीने की, यश और साहचर्य की 
“जब गिर जाएगी झूठ की आखिरी दीवार भी भीतर सुडौल हो जायेगा भावनाओं का नुकीला पत्थर घिसते-घिसते जो चुभ जाता था खुद को और चुभाया जाता था दूसरों को जब तृप्त हो जाएगी मन की आखिरी वासना भी जीने की, यश और साहचर्य की जब उत्तेजना के साधन नहीं जुटाने होंगे मन के शावक को तृप्त होगा वह उस कोमल शिशु की भांति जो जल की अनंत राशि पर लेटा तिरता है जब ऐसा होगा तो समाधि का फूल खिलेगा” कहा गुरू ने पूछा शिष्य ने, “जब तक खिले न समाधि का फूल, कोई ऐसा कैसे हो सकता है ? देख पायेगा वही भीतर असत्य का धुआं जो जाग गया है आत्मकामी होना बिना असीम सुख को पाए सम्भव ही नहीं “ गुरू ने एक फूल दिया शिष्य को और पूछा, “यह पहले खिला या सहे इसने बीज से फूल होने की यात्रा के दंश मिटाया अपने अस्तित्व को सही धूप और बारिश की मार वह बीज तुम हो ! समाधि का फूल जो खिलेगा एक दिन उसकी संभावना भीतर लिए हो !”

मंगलवार, अक्टूबर 29

वर्तमान का यह पल

वर्तमान का यह पल 

घट रहा है जीवन अनंत-अनंत रूपों में 
 वर्तमान के इस छोटे से पल में 
सूरज चमक रहा है इस क्षण भी 
अपने पूरे वैभव के साथ आकाश में 
गा रहे हैं पंछी.. जन्म ले रहा है कहीं, कोई नया शिशु 
फूट रहे हैं अंकुर हजार बीजों में 
गुजर रही है कोई रेलगाड़ी किसी सुदूर गांव से 
निहार रही हैं आँखें क्षितिज को किसी किशोरी की जिसकी खिड़की से 
वर्तमान का यह पल नए तारों के सृजन का साक्षी है 
पृथ्वी घूम रही है तीव्र गति से सूर्य की परिक्रमा करती हुई 
यह नन्हा क्षण समेटे है वह सब कुछ 
जो घट सकता है कहीं भी, किसी भी काल खंड में 
सताया  जा रहा है कोई बच्चा 
और  दुलराया भी जा रहा हो
कोई वृक्ष उठाकर कन्धों पर ले जा रहे होंगे कुछ लोग 
कहीं तोड़ रहे होंगे फल कुछ शरारती बच्चे 
इसी क्षण में रात भी है गहरी नींद भी 
स्वप्न भी, सुबह भी है भोर भी 
जो जीना चाहे जीवन को उसकी गहराई में 
जग जाए वह वर्तमान के इस पल में 
जिसमें सेंध लगा लेता है अतीत का पछतावा 
भविष्य की आकांक्षा, कोई स्वप्न या कोई चाह उर की 
हर बार चूक जाता है जीवन जिए जाने से 
हर दर्द जगाने आता है 
कि टूट जाये नींद और जागे मन वर्तमान के इस क्षण में...

शुक्रवार, अक्टूबर 4

जब कभी भारी हो मन


जब कभी भारी हो मन

जब कभी भारी हो मन
लगे, न जाने कैसा बोझ रखा है मन पर
कारण कुछ भी हो....तब यही सोचना होगा
शायद पूर्व के संस्कार जागृत हुए हैं
या कोई कर्म अपना फल देने को उत्सुक है
अथवा तो बोये थे जो बीज अतीत में.. वे अंकुरित हो रहे हैं  
जब जीवन कुछ सवाल लेकर सम्मुख खड़ा हो
हल्का था जो मन भारी बड़ा हो
शिरायें तन गयी हों मस्तिष्क की
आघात कर रहा हो हृदय पर कोई
हो कंधों में तनाव और उत्साह की कमी
चाहिए जब एक विश्राम गहरा... एक नींद सुकून भरी !
एक मस्ती भीतर... एक शांति अचाह भरी !
पर सिर्फ चाहने भर से कहाँ कुछ होता है ?
उसके लिए सतत प्रयासरत रहना पड़ता है
जो हो रहा है उसे पूरे मन से स्वीकारना होता है
या फिर छोड़ देना है सब कुछ अनाम के चरणों में
हर नकारात्मक विचार एक नये दु:स्वप्न की तैयारी है
पर इन सबको देखने वाला साक्षी तो वैसा का वैसा है
यह सब कुछ घट रहा है उसकी ऊर्जा से ही
जो कभी खत्म होने में नहीं आती... वह ऊर्जा अनंत है
युगों-युगों से काँप रहे हैं अर्जुनों के गांडीव
पर कृष्ण अचल... निर्द्वन्द्व है !

सोमवार, अक्टूबर 9

लीला एक अनोखी चलती



लीला एक अनोखी चलती 


सारा कच्चा माल पड़ा है वहाँ
अस्तित्त्व के गर्भ में....
जो जैसा चाहे निर्माण करे निज जीवन का !

महाभारत का युद्ध पहले ही लड़ा जा चुका है
अब हमारी बारी है...
वहाँ सब कुछ है !
थमा दिये जाते हैं जैसे खिलाडियों को
उपकरण खेल से पूर्व
अब अच्छा या बुरा खेलना निर्भर है उन पर !

वहाँ शब्द हैं अनंत
जिनसे रची जा सकती हैं कवितायें
या लड़े जा सकते हैं युद्ध,

वहाँ बीज हैं
रुप ले सकते हैं जो मोहक फूलों का
 बदल सकते हैं मीठे फलों में
परिणित किया जा सकता है जिन्हें उपवन में
या यूँ ही छोड़ दिया जा सकता है
सड़ने को !

उस महासागर में मोती पड़े हैं
जिन्हें पिरोया जा सकता है
मुक्त माल में
अनजाने में की गयी हमारी कामनाओं की
पूर्ति भी होती है वहाँ से
हम ही चुन लेते हैं कंटक....
जानता ही नहीं जो, उसे जाना कहाँ है
अस्तित्त्व कैसे ले जायेगा उसे और कहाँ ?
जो जानता ही नहीं खेल के नियम
वह खेल में शामिल नहीं हो पायेगा
लीला चल रही है दिन-रात
उसके और उसके अपनों के मध्य

हमारे तन पहले ही मारे जा चुके हैं
आत्माएं अमर हैं नये-नये कलेवर धर.... 

शनिवार, अक्टूबर 13

नहीं अचानक मरता कोई


नहीं अचानक मरता कोई


नव अंकुर ने खोली पलकें
घटा मरण जिस घड़ी बीज का,
अंकुर भी तब लुप्त हुआ था
अस्तित्त्व में आया पौधा !

मृत्यु हुई जब उस पौधे की
वृक्ष बना नव पल्लव न्यारे,
यौवन जब वृक्ष पर छाया
कलिकाएँ, पुष्प तब धारे !

किन्तु काल न थमता पल भर
वृक्ष को भी इक दिन जाना है,
देकर बीज जहां को अपना
पुनः धरा पर ही आना है !

नहीं अचानक मरता कोई
जीवन मृत्यु साथ गुंथे हैं,
पल-पल नव जीवन मिलता है
पल-पल हम थोड़ा मरते हैं !

शिशु गया, बालक जन्मा था
यौवन आता, गया किशोर
यौवन भी मृत हो जायेगा
मानव हो जाता जब प्रौढ़ !

वृद्ध को जन्म मिलेगा जिस पल
कहीं प्रौढता खो जायेगी,
नहीं टिकेगी वृद्धावस्था
इक दिन वह भी सो जायेगी

पुनः शिशु बन जग में आये
एक चक्र चलता ही रहता,
युगों-युगों से आते जाते
जीवन का झरना यह बहता !

मंगलवार, जनवरी 17

बीज से फूल तक


बीज से फूल तक


कृषि भवन के विशाल कक्ष में
शीशे के जार में बंद एक नन्हा सा बीज
था व्याकुल बाहर आने को
नयी यात्रा पर जाने को....
खरीदने की मंशा लेकर तभी आया एक किसान
तैयार थी माटी, रोपा गया वह बीज उसी शाम
तृप्त हुआ था बीज
 पाकर सिंचन
और ऊष्मा धरा की
उठने को आतुर था
गगन और पवन के सान्निध्य में
मर मिटने को था वह तैयार
मिलाने पंच भूतों की काया पंच भूतों से
पर नहीं था तैयार उसका खोल
जो आज तक था रक्षक
बना था बाधक
कांप उठा वह
क्या इस बार भी
भीतर ही भीतर सूख जायेगा
नन्हा सा अंकुर
नहीं... पुनः नहीं
जाना ही होगा इस खोल को
ताकि एक दिन फूल बनने की
 सम्भावना को तलाश सके बीज
एक नयी पीढ़ी को सौंप जाये अपनी विरासत
पूरी शक्ति से भेद डाला आवरण
आ ऊपर धरा के ली दीर्घ श्वास
अभी लंबी यात्रा तय करनी है
कितने मौसमों की मार सहनी है
कितनी हवाओं से सरगोशियाँ
तितली, भंवरों से
गुफ्तगू करनी है
वह उत्सुक है जीवन को एक बार फिर जीने के लिए
उत्सुक है हवा, जल और ऊष्मा को पीने के लिये   
 फूल बन कर अस्तित्त्व के चरणों में समर्पित होने के लिए
कैसा होगा वह पल जब
अपना सौंदर्य और सुरभि सौंप
बच जायेगा यह बीज उन हजार बीजों में
अस्तित्त्व भी प्रतीक्षा रत है
बनने साक्षी उस घड़ी का...