यह पल
जो अनंतानंत ब्रह्माडों का स्वामी है
वही भीतर ‘मैं’ होकर बैठा है
एक होकर मानो दो में बंट गया है
समय अखंड है, अखंड है चेतना
जैसे जीवन अखंड है
जन्म-मृत्यु, प्रकाश-छाया,
जगत-जगदीश्वर
भेद सारे माया ने दिखाए !
हर नया पल बन सकता है बीज
आने वाले हजार पलों का जन्मदाता
यदि जाग जाये कोई इस पल में
तो धीरे से वह अनंत मन को छू जाता
न जाने किस श्वास में
वर्तमान का एक पल
प्रेम की डाली से झरे फूल की तरह
भर जाये विश्वास की सुवास
या सीप में गिरी
मोती बनने को उत्सुक बूँद की तरह
छू जाए अंतर का आकाश !










