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गुरुवार, अक्टूबर 30

वही थाम लेता राहों में

वही थाम लेता राहों में 


कोई लिखवा जाता है ज्यों 

जहाँ कलम, कागज सम्मुख है, 

अक्षर भरते से जाते हैं 

मौन सदा, जो जगत प्रमुख है !


वही शब्द है वही अर्थ भी 

वही गीत प्राणों में भरता, 

वही श्वास बन आता जाता 

वही स्वयं से जोड़े रखता !


जिसके होने से ही हम हैं 

एक पुलक बन तन में दौड़े, 

वही थाम लेता राहों में 

व्यर्थ कहीं जब मन यह दौड़े ! 


 होकर भी ना होना जाने 

उसके ही हैं हम दीवाने, 

 जिसे भुला के जग रोता है 

याद करें हम लिखें तराने !


जो भी उसकी याद दिलाये 

वही गुरू सम पूजा जाये, 

सपनों की अब कौन सुने? जब 

नींदों को ही हर ले जाये !


बुधवार, नवंबर 29

पथ दिखाता चाँद नभ में

पथ दिखाता चाँद नभ में 


एक ज़रिया है कलम यह

हाथ भी थामे इसे जो, 

कौन जो लिखवा रहा है 

लिख रहा जो कौन है वो !


भाव बनकर जो उमड़ता 

बादलों सा कभी उर में, 

लहलहाती है फसल फिर 

अक्षरों की तब मनस में !

 

कभी सूखा मरुथलों सा 

ज्यों शब्द भी गुम हो गये,

हाथ में अपने कहाँ कुछ 

थाम ली  जब डोर  उसने !


चाह फिर क्योंकर जगायें 

हो रहा जो वही शुभ है, 

पथ दिखाता चाँद नभ में 

सूर्य  उतरा धरा पर है !


गुरुवार, अक्टूबर 21

शून्य का अर्थ

शून्य का अर्थ


घुटनों पर नोटबुक कलम हाथ में 

मानो कोरा काग़ज़ आमंत्रण दे 

दिल से होते 

कुछ बंध उतरे 

मन व हाथों में यह कैसा नाता है 

अंतर्जगत को जो पन्ने पर उकेर आता है 

अमूर्त को मूर्त किया 

शब्द का रूप दिया 

उपजे थे चेतना से 

कोई नहीं जिससे परे 

अंतत: शून्य को ही 

 कलम पन्ने पर उतारती 

लाख प्रयत्न करें पर 

जिसे हम पढ़ नहीं पाते 

क्या इसीलिए लोग कविता के 

अपने-अपने अर्थ लगाते !


गुरुवार, फ़रवरी 18

जो झर रहा है आहिस्ता से


जो झर रहा है आहिस्ता से

जब वह पकड़ लेता है कलम अपने हाथों में 

तो झर-झ र झरते हैं शब्द अनायास ही 

वरना छोटे पड़ जाते हैं सारे प्रयास ही 

छोड़ दो उसकी राह में 

अंतर के सारे द्वन्द्व 

बात ही न करो सीमित की 

वह अनंत है 

रास नहीं आती उसे शिकायतें 

वह तो बहना चाहता है 

ऊर्जा का..  उल्लास का..  सागर बनकर रगों में 

जो ‘है नहीं’ उसकी चर्चा में सिर खपाना क्या 

जो ‘है’ उसका गुणगान करो 

जो छिपा है पर नजर नहीं आता उसे महसूस करना है 

जो झर रहा है आहिस्ता से 

उसे कण -कण में भरना है 

वह जीवन है विशाल है 

अपना मार्ग खुद बनाएगा 

उसे हाथ पकड़कर चलाने की जरूरत नहीं है 

वह तुमको राह दिखाएगा 

अनूठा है उसका सम्मान करो 

न कि व्यर्थ ही जीवन में व्यवधान भरो ! 


 

शनिवार, अक्टूबर 24

व्यक्त वही अव्यक्त हो सके

 व्यक्त वही अव्यक्त हो सके 

हे वाग्देवी ! जगत जननी  

वाणी में मधुरिम रस भर दो, 

जीवन की शुभ पावनता का 

शब्दों से भी परिचय कर दो !


भाषा का उद्गम तुमसे है 

नाम-रूप से यह जग रचतीं,

ध्वनि जो गुंजित है कण-कण में 

नव अर्थों से सज्जित करतीं !


शिव-शिवानी अ, इ में समाए

क से म पंचम वर्गीय सृष्टि,

हर वर्ण में अर्थ भरे कई

मिले शब्दों से जीवन दृष्टि !


कलम उठे जब भी कागज पर 

व्यक्त वही अव्यक्त हो सके, 

निर्विचार से जो भी उपजे 

भाव वही प्रकटाये मानस !


हे देवी ! पराम्बा माता 

कटुता रोष, असत् सब हर ले, 

गंगा की निर्मलधारा सम 

रचना में करुणा रस भर दे !


सोमवार, अप्रैल 3

एक रहस्य

एक रहस्य

थम जाती है कलम
बंद हो जाते हैं अधर
ठहर जाती हैं श्वासें भी पल भर को
लिखते हुए नाम भी... उस अनाम का
नजर भर कोई देख ले आकाश को
या छू ले घास की नोक पर
अटकी हुई ओस की बूंद
झलक मिल जाती है जिसकी
किसी फूल पर बैठी तितली के पंखों में
या गोधूलि की बेला में घर लौटते
पंछियों की कतारों से आते सामूहिक गान में
कोई करे भी तो क्या करे
इस अखंड आयोजन को देखकर
ठगा सा रह जाता है मन का हिरण
इधर-उधर कुलांचे मारना भूल
निहारता है अदृश्य से आती स्वर्ण रश्मियों को
जो रचने लगती हैं नित नये रूप
किताबों में नहीं मिलता जवाब
एक रहस्य बना ही रहता है..

मंगलवार, नवंबर 29

मौन


मौन 

सिमट गयी है कविता 
या छोड़ दिया है खजाना शब्दों का 
उस तट पर 
मंझदार ही मंझदार है अब 
दूसरा तट कहीं नजर नहीं आता 
एक अंतहीन फैलाव है और सन्नाटा 
किन्तु डूबना होगा सागर की अतल गहराई में 
शैवालों  के पार....
जहाँ ढलना है ऊर्जा को सौंदर्य और भावना में 
जीवन की सौगात को यूँ ही नहीं लुटाना है 
कवि के हाथों में जब तक कलम है 
और दिल में शुभकामना है उसे 
वक्त के हर अभिशाप को वरदान में ढालना है !

शनिवार, जनवरी 31

एक इल्तजा


एक इल्तजा


दबा न रहे राख में दहकने दो अंगारा
मखमली सुर्ख चमकने दो अंगारा,
जल जाने दो हर सूं... कि निखर आएगा रूप
बरस जाने के बाद ज्यों खिल के निकले है धूप !

रहे न कोई पर्दा आज गिर जाने दो हर दीवार
कभी तो हो वह सामने... कभी तो हो दीदार
हट जाने दो हर शर्मोहया आज सामने आओ
फिर न मिलेगी यह रात अब न शरमाओ !

ओ खुदा ! अब न तुझे दूर से पुकारेंगे
तेरे हैं हम हक से तुझे निहारेंगे
अब निभाने होंगे वे सारे वादे तुझे
नहीं बहला सकेगा अब दूर से मुझे !

अजीब बात है यह वह ही लिखवाता है
खुद से मिलने के सिले किये जाता है,
‘मैं’ तो हूँ ही नहीं इस कहानी में
 बस थामी है कलम हाथ में, नादानी में !


रविवार, सितंबर 4

आज शिक्षक दिवस है



एक विद्यार्थी और शिक्षक का सम्बन्ध अन्य सामाजिक सम्बन्धों की तरह किसी स्वार्थ पर नहीं टिका होता, वह विश्वास, प्रेम और ज्ञान के तंतुओं से बुना होता है... प्रस्तुत है एक संवेदनशील विद्यार्थी की डायरी से अपनी  शिक्षिका की कुछ स्नेहिल स्मृतियों पर आधारित एक रचना.

शिक्षक दिवस पर

शांत जल पर धीरे-धीरे तिरती नाव की तरह
कक्षा आगे बढती जाती है...
ब्लैक बोर्ड पर टिकी है दृष्टि
कान सुनते हैं .... कलम चलती है
और कहीं मध्य में इन सबके
आंखें उनके चेहरे पर
ममतामयी माँ की झलक देख ही लेती हैं...

.....कभी न कह पाए हों उनसे
किन्तु निज पीड़ा के क्षणों में
उन कंधों पर ही सर रखकर क्या नहीं रोये हैं....

ऊपर से कठोर बनने की कोशिश करतीं
अंदर से फूल की तरह कोमल
स्नेह की खुशबू फैलाती हुईं....
कई बार टूटते मनोबल का सहारा दिया है
उनके ओजस्वी शब्दों ने ...

अविरल भाषा प्रवाह, अनुशासन
और कभी अप्रत्याशित छूट
तब कहाँ सोचा था कि कभी याद आएँगी
इधर-उधर भटकने से रोकेंगी वे नसीहतें...
और एक प्यारी सी मुस्कान
राह दिखाएगी, सहलाएगी
सदा जीवन की अनजानी पगडंडियों पर !

जो भी कहना चाहता था मन
सही-गलत, सार्थक-अर्थहीन
सभी कुछ बेझिझक कहा है उनसे
कक्षा में उठते अजीबोगरीब सवाल और
लम्बी-लम्बी बहसें... याद आती हैं उनकी बातें
फिर गोल चेहरे पर
सहज आ जाती दपदप हंसी
जैसे चेहरे का ही भाग हो....

आए थे सहमे-सहमे
ढूंढते स्वयं को
खोजते पहचान निज की,
नए अनुभवों ने किया भी  
वांछित व्यवहार परिवर्तन !
समझ सकते हैं अब खुद को बेहतर
मूल्यों और आदर्शों की पृष्ठभूमि में
लिए कई सपने और आशाएं मन में....
एक शिक्षक का काम सपने दिखाना भी तो है !