एक अजब सी अकुलाहट है
तन के कण-कण में विद्युत है
जहाँ जोड़ दो वह भर देती,
इक उलझन भी समाधान भी
घोर अँधेरा अथवा ज्योति !
बाहर प्राण ऊर्जा बिखरी
दैवी भी आसुरी भी है,
जिसे ग्रहण करने को आतुर
उससे युक्त सदा करती है !
द्रष्टा जिससे जुड़ जाता है
वही भाव प्रबल हो जाता,
पृथक रहे यदि वह उससे
क्षोभ न कोई छू भी पाता !
जंग लगे जब मन-बुद्धि में
एक अजब सी अकुलाहट है,
विष जब भीतर बढ़ने लगता
बढ़ती जाती घबराहट है !
रोग बनी फिर तन में रहती
या नृत्य की थिरकन बनती,
एक ऊर्जा जीवन देती
वही प्राण में सिहरन भरती !