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बुधवार, नवंबर 25

जीवन क्या है ?

 जीवन क्या है ?

स्थूल से सूक्ष्म तक जाने की यात्रा

अथवा ज्ञात से अज्ञात को 

दृश्य से अदृश्य को पकड़ने की चाह

रूप के पीछे अरूप

ध्वनि के पीछे मौन को जानने का प्रयास !

या पीड़ा के पीछे आनंद

 सुख के पीछे दुख

 संयोग के पीछे वियोग

 शिखर के साथ खाई  

 गगन के साथ सागर की अतल गहराई में उठना और गिरना ?

अथवा

अधर में लटकते ग्रह-नक्षत्र और पृथ्वी को देख

जानना यह सत्य

कहाँ गहराई कौन सी ऊँचाई

कौन आगे कौन पीछे 

सब कुछ वृत्ताकार है जहाँ

न आदि न अंत 

घड़ी भर पहले जो सुख था अब दुःख है 

एक में दूसरा छिपा है साथ-साथ 

सब कुछ मात्र है 

जाने कब से और  रहेगा जाने कब तक

सम्भवतः यही जीवन है ! 


सोमवार, मई 25

साँझा नभ साँझी है धरती

साँझा नभ साँझी है धरती 


दोनों के पार वही दर्शन 
जो दृश्य बना वह द्रष्टा है, 
जल लहरों में सागर में भी 
जो सृष्टि हुआ वह सृष्टा है !

हर दिल में इक दरिया बहता 
क्यों दुइ की भाषा हम बोले, 
साँझा नभ साँझी है धरती 
इस सच को सुन क्यों ना डोलें !

नीले पर्वत पीली माटी
हरियाली की छाँव यहीं है !
 तेरा मेरा नहीं सभी का 
दूजा कोई जहान नहीं है, 

हवा युगों से सबने बाँटी
तपिश धूप की, दावानल की, 
जल का स्वाद कभी ना बदला  
पीने वाला हो कोई भी !

सबको इक दिन जाना मरघट 
और निभाना फर्ज एक सा,
किसकी खातिर युद्ध हो रहे 
रिश्तों में है दर्द एक सा ! 


शनिवार, मार्च 21

जब राज खुलेगा इक दिन यह

जब राज खुलेगा इक दिन यह 


जो द्रष्टा है वह दृश्य बना 
स्वप्नों में भेद यही खुलता,
अंतर बंट जाय टुकड़ों में 
फिर अनगिन रूप गढ़ा करता !

सुख स्वप्न रचे, हो आनन्दित 
दुःख में खुद नर्क बना डाले,
कभी मुक्त मगन उड़ा नभ में 
कभी गह्वर, खाई व नाले !

जो डरता है, खुद को माना
जो डरा रहे, हैं दूजे वे, 
खुद ही है कौरव बना हुआ 
बाने बुन डाले पांडव के !

जब राज खुलेगा इक दिन यह 
मन विस्मित हो कुछ ढगा हुआ, 
स्वप्नों से जगकर देखेगा
मैं ही था सब कुछ बना हुआ !

मैं ही हूँ, दूजा यहाँ नहीं 
यह मेरे मन की माया थी, 
वे दुःस्वप्न सभी ये सुसपने 
केवल अंतर की छाया थी !


गुरुवार, अप्रैल 4

ट्रेन की खिड़की से


ट्रेन की खिड़की से



उस दिन दिखे थे
दूर तक फैले सजे-संवरे चौकोर खेत
कतारों में उगी फसलें
तैरती बत्तखें, लघु नाव
निकट पटरियों के पोखर में
बांसों के झुरमुट गुजरे कि नजर आये
चरती हुई गायों के झुण्ड 
पानी में जलकुम्भी पर उग आए बैंगनी फूल
मीलों तक फैले कदलीवन
भा गया एक छतरीनुमा वृक्ष
कहीं ढेर खपरैल के
उठता धुआँ साफसुथरी झोंपड़ी से
छप्पर पर छायी बेलें
कटे हुए भूरे ढेर फसलों के
भैंस पर सवारी करते नंग-धड़ंग बच्चे
हरियाली के प्रांगण में खिली सरसों की पीलिमा
दूर क्षितिज तक पसरे आकाश की नीलिमा
किसी खेत में जलते पुआल का धुआँ
पगडंडी पर बोझा ढोती एक ग्राम बाला
पीछे-पीछे खिलखिलाती युवतियों का दल
ऊपर गुजरती रेल, नहर का स्वच्छ जल  
पगडंडी पर धूल उड़ाती मोटरसाइकिल
उमड़ आयी किसी स्टेशन पर बच्चों की भीड़
मोबाईल टावर जो जगह-जगह उठ आए
पीले फूल जो सड़क किनारे स्वयं थे उग आए
बिजली के खम्बे, खंडहर, पुआल के टाल
नजर आया कोई ठूंठ
पेड़ सुनाते पतझड़ का हाल
दनदनाती लम्बी मालगाड़ी से
अचानक रुक गया दृश्य, कि दिखा
हरे घास के बीच चमकता
स्वच्छ जल, जैसे जड़ा हो नगीना
गांव के रेलवे फाटक के पार दौड़ते बच्चे
जीती जागती फिल्म
सत्यजीत रे की हो जैसे
गोधूलि उड़ातीं गउओं के झुण्ड
समांतर सड़क पर दौड़ते वाहन
दृष्टि अटकी, सरवर में सलेटी बगुले
काली मिट्टी पर थे जिनके पैरों के निशान
पानी में झांकते उड़ते बगुलों के प्रतिबिम्ब
याद दिला गए भूले बिसरे बिम्ब
विशाल नदी का पुल किया पार
होने लगा संध्या का प्रसार
अँधेरे में गुम होते झोंपड़े
जंगल काले पेड़ों के
बीच-बीच में आ जाती कोई नहर या नदी
स्टेशन पर खड़ी दूसरी ट्रेन में
 कालेज छात्राओं की हँसी
एक बच्चे की तुतलाहट
भर गयी थी भीतर एक तरावट
उस दिन ट्रेन की खिड़की से...झांकते !








गुरुवार, अप्रैल 26

दृश्य नहीं वह द्रष्टा है


दृश्य नहीं वह द्रष्टा है
  
वह कैद नहीं है मंदिर में
दृश्य नहीं वह द्रष्टा है,
 नाम-रूप में बंध न सके
सृष्टि नहीं वह सृष्टा है !

झांक रहा इन नयनों से
श्रवणों से शब्द वही धारे,
कोमलतम स्पर्श उसी से हैं
उससे ही भाव उठे सारे  !

वह बन विद्युत तन में दौड़े
मन-प्राण उसी के बल पर हैं,
वह सहज सदा रहता भीतर
दूरी न हमसे पल भर है !

उसमें विश्राम करे कोई
सँवर गया निज दर्पण में,
पल भर भी ध्यान धरे कोई
खो जाता दिल की धड़कन में !

ज्यों बालक माँ से विमुख हुआ
बस खेल खिलौनों से खेले,
जीवन की उथल-पुथल कैसी
वह देख रहा कुछ न बोले !

वह देखे ही जायेगा, गर
हम रुक कर उसको न चीन्हें
है धैर्य, बड़ी करुणा उसमें
निजता को तिल भर न छीने !