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शनिवार, जनवरी 22

यहाँ हवाएं भी गाती है


यहाँ हवाएं भी गाती है

सुनना है सुख,  पुण्य  प्रदायक
सुनने की महिमा है अनुपम, 
करे श्रवण जो बनता साधक 
मिल जाता इक दिन वह प्रियतम !

निज भाषा में सुनने का फल
 सहज ही हों सभी कर्म कुशल, 
अध्ययन वृत्ति, श्रवण है भक्ति
 मन की धारा बनती निर्मल !

राग सुनो, आलाप सुनो तुम 
मधुरिम तान सुनो कोकिल की,
यहाँ हवाएं भी गाती है
 सरिता बहती सुर सरगम की! 

कल-कल नदिया की भी सुनना 
बादल का तुम सुनना गर्जन,
गुनना पंछी की बोली को ,
सागर की लहरों का तर्जन !

पिउ पपीहा, केकी मोर की
सुनना भी है एक विज्ञान,  
गूँज मौन की सुन ले कोई 
हृदय गुह में जगता प्रज्ञान !

शुक्रवार, दिसंबर 16

दृष्टि धूमिल मोहित है मन

दृष्टि धूमिल मोहित है मन 

 किसी-किसी दिन झूठ बोलता लगता दर्पण
नयन दिखाते वही देखना चाहे जो भी मन !

दृष्टि धूमिल मोहित है मन 
धुंधला-धुंधला सा संसार,
प्रिय को महिमामंडित करता 
छलक रहा जब अंतर प्यार !

सत्य छिपा ही रहता इक तरफ़ा जब अर्पण 
श्रवण सुनाते वही सुनना चाहे जो भी मन !

पक्षविहीन खड़ा  हो जग में 
शक्तिहीन के लिए असम्भव,
झुक जाता है निज पक्ष में 
झेल आत्मा का पराभव !

थोड़े में सन्तुष्ट हुआ जो काट सके न बंधन 
बुद्धि सुझाती वही जानना चाहे जो भी मन !


गुरुवार, अप्रैल 26

दृश्य नहीं वह द्रष्टा है


दृश्य नहीं वह द्रष्टा है
  
वह कैद नहीं है मंदिर में
दृश्य नहीं वह द्रष्टा है,
 नाम-रूप में बंध न सके
सृष्टि नहीं वह सृष्टा है !

झांक रहा इन नयनों से
श्रवणों से शब्द वही धारे,
कोमलतम स्पर्श उसी से हैं
उससे ही भाव उठे सारे  !

वह बन विद्युत तन में दौड़े
मन-प्राण उसी के बल पर हैं,
वह सहज सदा रहता भीतर
दूरी न हमसे पल भर है !

उसमें विश्राम करे कोई
सँवर गया निज दर्पण में,
पल भर भी ध्यान धरे कोई
खो जाता दिल की धड़कन में !

ज्यों बालक माँ से विमुख हुआ
बस खेल खिलौनों से खेले,
जीवन की उथल-पुथल कैसी
वह देख रहा कुछ न बोले !

वह देखे ही जायेगा, गर
हम रुक कर उसको न चीन्हें
है धैर्य, बड़ी करुणा उसमें
निजता को तिल भर न छीने !