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शुक्रवार, मार्च 29

इस उमंग का राज छुपा है



इस उमंग का राज छुपा है 


जाने क्यों दिल डोला करता
नहीं किसी को तोला करता,
जब सब उसके ही बंदे हैं
भेद न कोई भोला करता !

नयना चहक रहे क्यों आखिर
अधरों पर स्मित ठहरी कब से,
जन्मों का क्या मीत मिला है
थिरक रहे हैं कदम तभी से ?

रुनझुन सी बजती है उर में
गुनगुन सी होती अंतर में,
छुप-छुप किसके मिले इशारे
निकल गया दिल किसी सफर में !

टूटी-फूटी गढ़ी इबारत
हाल बयां क्योंकर हो पाये,
मीरा भी दिखा नहीं पायी
राम रतन नजर कहाँ आये !

शुक्रवार, दिसंबर 7

अपने जैसा मीत खोजता




अपने जैसा मीत खोजता


ओस कणों से प्यास बुझाते,
जगती के दीवाने देखे,
चकाचौंध पर मिटने वाले
बस नादां परवाने देखे !

जो है, वही उन्हें होना है
अपने जैसा मीत खोजते,
घर है, वहीं उन्हें बसना है
वीरानों में रहे भटकते !

बदल रहा है पल-पल जीवन
जिसमें थिरता कभी न मिलती,
बांट रहा है किरणें सूरज
दिल की लेकिन कली न खिलती !

घुला-मिला सा खारापन ज्यों
तप कर निर्मल नीर त्याग दे,
छुप कर बैठा निजता में ‘पर’
वैरागी वह मिटा राग दे !

 गीत सुरीला गूँज रहा है
कोई चातक श्रवण लगाए,
मतवाला ढूंढें न मिलता
उर में पावन प्रीत जगाए !


शनिवार, दिसंबर 19

कैसे यह बात घटी


कैसे यह बात घटी


सबको घर जाना है
आज नहीं कल यहाँ
 उतार वस्त्र देह का
हो जाना रवाना है !

भुला दिया जीत में
कभी जगत रीत में
मीत सभी हैं यहाँ
कोई न बेगाना है

सबको घर जाना है !

कैसे यह बात घटी
लक्ष्य से नजर हटी
स्वयं को ही खो दिया
मिला न ठिकाना है !

भेद जो भी दीखते
ऊपर ही सोहते
एक रवि की किरण
बुने ताना-बाना है !

बुधवार, फ़रवरी 25

नई दुनिया में


नई दुनिया में



नहीं, उसका मिलना ऐसा नहीं था
जैसे कोई बिछड़ा मीत मिल जाये
उसने तो छुड़ा दिए थे सारे नाते और
फिर से मिला दिया था सबसे किसी और तल पर
दुनिया भी अब पहले वाली नहीं रही थी न ही वह खुद !
सारे समीकरण ही बदल गये थे इस नई दुनिया में
यहाँ पाने का अर्थ देना होता था   
व्यर्थ को त्याग सार को लेना होना होता था

नहीं, उसका होना ऐसा नहीं था
जैसे कोई दिखाए अपनी जायदाद को
उसने तो छीन लिए थे
आत्मा के वस्त्र तक
और फिर से दिला दी थी चाँद-तारों की वसीयत
अस्तित्त्व भी पहले की तरह नहीं रहा था मौन
न ही उसके कान बहरे !

सोमवार, दिसंबर 8

दुःख की ही गाथा बनती है

दुःख की ही गाथा बनती है



मौन हुए स्वर, सूना अंतर
फिर भी सब पाया लगता है,
अब जब लिखने की फुर्सत है
मन का घट खाली लगता है !

टूटी जब से दुःख की गागर
गीत विरह के भी छूटे,
चाह मिटी जब अंतर मन से
स्वप्न हृदय के सब रूठे !

दुःख की ही गाथा बनती है
सुख तो खाली हाथ खड़ा,
कलम थमी अब शब्द न मिलते
भीतर है आराम बड़ा !

नहीं शिकायत कोई जग से
अब क्या शायर गजल कहे,
मीत छिपा है अपने घर में
अब क्यों बिरहन पीर सहे !

अब तो चैन पड़ा है दिल को
कागज कोरा ही रह जाता,
तृप्त हुआ है पंछी मन का,
अब न कहीं दौड़ा जाता !

मंगलवार, मार्च 18

कौन है वह


कौन है वह



दिल की गहराई जो जाने
उसके सम्मुख ही दिल खोलें

जन्मों का जो मीत पुराना
मन की बात उसे ही बोलें

दूर तलक जो साथ चलेगा
पथ में उसके संग ही डोलें

काँटों को जो फूल बना दे
संग उसके ही स्वप्न पिरो लें

अंतर वीणा को जो गा दे
उसके ही नयनों को तोलें  

सम्भव सब है इस चोले में
मानव हो हर दुःख को धो लें

जो भी इर्द - गिर्द फैला है
उत्सव बनकर उसमें खो लें




रविवार, अप्रैल 14

कोई है


कोई है

कोई है
सुनो ! कोई है
जो प्रतिपल तुम्हारे साथ है
तुम्हें दुलराता हुआ
सहलाता हुआ
आश्वस्त करता हुआ !

कोई है
जो छा जाना चाहता है
तुम्हारी पलकों में प्यार बनकर
तुम्हारे अधरों पर मुस्कान बनकर
तुम्हारे अंतर में
सुगंध बनकर फूटना चाहता है !

कोई है
थमो, दो पल तो रुको
उसे अपना मीत बनाओ
खिलखिलाते झरनों की हँसी बनकर
जो घुमड़ रहा है तुम्हारे भीतर
उजागर होने दो उसे !

कोई है
जो थामता है तुम्हारा हाथ
हर क्षण
वह अपने आप से भी नितांत अपना
बचाता है अंधेरों से ज्योति बन के
समाया है तुम्हारे भीतर
उसे पहचानो
सुनो, कोई है !

रविवार, दिसंबर 5

सदा प्रेम की यही कहानी

सदा प्रेम की यही कहानी

जितनी प्रीत पुरानी होगी
रंग उतना गहनतम होगा,
बंधन जितना पहचाना हो
मन उतना ही ठहरा होगा !

खोज नए की, चाह पुरानी
सदा प्रेम की यही कहानी !

जितना साथ चलेंगे मीत
रस्ता उतना आसां होगा,
जानीबूझी डगर लगेगी
प्रियतम यदि मेहरबां होगा !

नयन थमे हैं, अटकी वाणी
अकथ प्रेम की अजब बयानी !

कदमों के नीचे है मंजिल
पल भर को तो रुकना होगा,
ऊपर उठना है यदि उसको
पहले दर पर झुकना होगा !

याद उसी की लगे सुहानी
सदा वफ़ा की यही कहानी !

जलवा हर सूं है उसका ही
तुझे कहीं कब जाना होगा ,
नयन मूंद ले थम के भीतर
साथ उसी का पाना होगा !

श्वासों में उसी की रवानी
है अबूझ प्रेमी की बानी  !




अनिता निहालानी
५ दिसंबर २०१०