रविवार, सितंबर 13

पंत


 पंत

प्रकृति के, सुकुमार कवि 

घुंघराले केश सजे आनन पर, 

वाणी मधुर, कोमल छवि 

कविता फूटी स्वतः झर-झर !

प्रकृति के सुंदर चितेरे 

नामकरण स्वयं का किया, 

फूलों, वृक्षों से गहरे नाते  

बचपन से ही काव्य रचा !

घर में छोटे, बड़े दुलारे 

सुंदर वस्त्रों का आकर्षण, 

किन्तु सदा वैरागी था मन

साधु-सन्तों का संग किया 

घँटों ध्यान साधना करते, 

उस अखण्ड अविनाशी से व

लौ लगाई उसके जग से 

जिसने जो माँगा, सहर्ष दिया 

भिक्षु हो या मित्र, संबन्धी 

अपना हो या दूर का परिचित, 

कभी भेद न करते तिलभर 

बापू को आराध्य बनाया 

अरविन्द से मिली शांति चिरन्तन, 

महादेवी, निराला, दिनकर का

 साथ मिला, मित्र थे बच्चन !

कला-विज्ञान, मेल हो कैसे 

करते रहे सदा समन्वय, 

अकुलाया था अंतर, लख कर

ग्रामीणों का जीवन दुखमय !

स्त्री रूप में लख प्रकृति को 

नारी को सम्मान दिया, 

रूप-भाव दोनों का ही 

उर अंतर से अनुभव किया  ! 


शुक्रवार, सितंबर 11

रह जाता वह मुस्का कर

रह जाता वह मुस्का कर


स्मृतियों के अंबार तले यह 

दीवाना सा मन पिसता है, 

जन्मों-जन्मों जो बीज गिरे 

उन फसलों में अब घिरता है !


दिन भर जतन से साधा इसको 

स्वप्नों में सभी भूल गया, 

निद्रा देवी के अंचल में 

विश्राम मिला ना शूल गया !


दिवस रात्रि यह खेल चल रहा 

कोई देखे जाता भीतर, 

जिन भूलों पर झुँझलाता उर  

बस रह जाता वह मुस्का कर !


लक्ष्य बाहरी लगते धूमिल 

यही जागने की बेला है,

चौराहे पर बाट जोहती 

मृत्यु, शेष रही नहीं मंजिल !


अब तो द्वार खुले अनंत का 

मन में गूँजे बंसी की धुन, 

चाहों के जंगल अर्घट हों 

रस्ता दें झरनों को पाहन !



 

गुरुवार, सितंबर 10

हर पल में इक द्वार खुल रहा

 हर पल में इक द्वार खुल रहा 

भूल गया जग गहन नींद में 

फिर भी खुद का भान हो रहा,

शब्दों ने घेरा स्वप्नों में  

मनस वहाँ ब्रह्मांड हो रहा !


कभी डराते, चेताते भी 

दु;स्वप्न जगाते भ्रम जाल से,  

किन्तु जागकर अक्सर ही मन 

डूबा रहे खामख्याल में !


हर पल में इक द्वार खुल रहा 

उस अनंत की झलक  दिखाए, 

किन्तु सांत का छोटा सा कण 

नजरों  से ओझल कर जाये !


इक दिन सब कुछ अच्छा होगा 

उस दिन की आस ही व्यर्थ है, 

नए-नए हम बीज बो रहे 

क्या जीवन का यही अर्थ है ! 


एक बार यदि रुककर कोई 

क्षण में सहज प्रवेश करेगा,

कालातीत असीम सत्य का  

निश्चय ही सन्देश सुनेगा !


बुधवार, सितंबर 9

जरा जाग कर देखा खुद को

जरा जाग कर देखा खुद को 

 

स्वप्न खो गए जब नींदों से 

चढ़ा प्रीत का रंग गुलाल, 

दौड़ व्यर्थ की मिटी जगत में 

झरा हृदय से विषाद, मलाल !

 

द्रष्टा  बन मन जगत निहारे 

बना कृष्ण का योगी,अर्जुन,

कर्ता का जब बोझ उतारा

कृत्य नहीं अब बनते बन्धन !

 

श्वास चल रही रक्त विचरता 

तन अपनी ही धुन में रमता, 

क्षुधा उठाते प्राण, तृषा भी 

कहाँ साक्षी कुछ भी करता !

 

जरा जाग कर देखा खुद को 

सदा पृथक जग से पाता है, 

युग-युग से यह खेल चल रहा 

विवर पात सा उड़ जाता है !

 

वृक्ष विशाल, गगन को छूते  

क्या करते वे, सब होता है, 

जग यूँ ही डोलेगा कल भी 

बोझ न उर पर वह ढोता है !

 

 

मंगलवार, सितंबर 8

शब्दों के वह पार मिलेगा

 शब्दों के वह पार मिलेगा 

जब  खिलेगा भीतर मौन का पुष्प 

वहाँ न भावनाओं की डालियाँ होंगी 

न विचारों की भूमि !!

 

शब्दों की नाव तो बनानी ही होगी 

जो उतार देगी शून्य के तट पर !

 

शब्द ले जाते हैं खुद से दूर 

शब्द जगत हैं 

माया हैं !

 

सत्य की यदि चाह है 

तो उस आग से गुजरना होगा 

जहाँ जल जाता है सारा ज्ञान

उस सागर को पार करना होगा 

जहाँ दिखाई ही नहीं देता दूसरा तट

सूख जाता है हर सागर 

मौन के उतरते ही

बवंडर से गुजर भावों और विचारों के

उस शांति को करना होगा महसूस

जो मिटा देती है सबकुछ

पर जिसके बाद जन्म होता है 

एक नवीन सृष्टि का ! 


सोमवार, सितंबर 7

अमर स्पर्श -3

अंतिम भाग

अमर स्पर्श

नारी के प्रति पन्त जी के हृदय में अत्यधिक सम्मान है. वह कहते हैं स्त्री का हृदय तिजोरी में बन्द है. उसपर समाज की बहुत बन्दिशें हैं. स्त्री का सबसे सुंदर हिस्सा उसकी भावना है. उसकी भावना का फूल अभी तक धरती पर खिल नहीं पाया है. वह उस समय की कल्पना करते हैं जब स्त्री स्वतन्त्र होकर धरती पर विचरण कर सकेगी, उसे कोई भय नहीं होगा.


'मुक्त करो नारी को मानव, 

चिर वन्दिनी नारी को। 

युग-युग की निर्मम कारा से, 

जननी सखि प्यारी को।'


श्री अरविन्द जी की पुस्तक ’भागवत जीवन’’ से वे इतने प्रभावित हुए कि उनके जीवन की दिशा ही बदल गई पन्त जी कहते हैं कि ’’इसमें सन्देह नहीं कि अरविन्द के दिव्य जीवन दर्शन से मैं अत्यन्त प्रभावित हूँ। श्री अरविन्द आश्रम के योगयुक्त अन्तःसंगठित वातावरण के प्रभाव से उर्ध्व  मान्यताओं सम्बन्धी मेरी अनेक शंकाएँ दूर हुई है।’’  इस युग की रचनाओं में पन्त जी ने मानव को उर्ध्वचेतन बनने की प्रेरणा दी है। पन्त जी आन्तरिक व मानसिक समता को अत्यन्त आवश्यक मानते है। इस काल की कविताओं में कवि ने चेतना को सर्वोपरि माना है। कवि ने ब्रह्म जीव और जगत तीनों को एक ही चेतना का रूप स्वीकार किया है। वह जड़ और चेतन में कोई भेद नहीं मानता।


वही तिरोहित जड़ में जो चेतन में विकसित।

वही फूल मधु सुरभि वही मधुलिह चिर गुंजित।।


पन्त कहते हैं, विज्ञान ने जड़ जगत की हर बाधा को मिटा दिया है. देश-विदेश एक दूसरे के निकट आ रहे हैं. किन्तु विज्ञान मनुष्य के भीतर का अंधकार नहीं मिटा सकता. वह सभ्य बना सकता है पर सुसंस्कृत नहीं बना सकता. इसके लिए तो भारत के प्राचीन दर्शन में निहित मूल्यों को ही ग्रहण करना होगा. इसलिए भौतिकता और अध्यात्म का समन्वय होना चाहिए. भगवान को यदि देखना है तो इसी जीवन में देखना होगा. आज विज्ञान और अध्यात्म को मिलकर काम करना है. वह मार्क्स से भी प्रभावित हुए, गाँधी जी से से भी, जिन्होंने भारतीय दर्शन को कर्मभूमि में उतार दिया. 


किन तत्वों से गढ़ जाओगे तुम भावी मानव को ?

किस प्रकाश से भर जाओगे इस समरोन्मुख भव को ?

सत्य अहिंसा से आलोकित होगा मानव का मन ?

अमर प्रेम का मधुर स्वर्ग बन जाएगा जग जीवन ?

आत्मा की महिमा से मंडित होगी नव मानवता ?

प्रेम शक्ति से चिर निरस्त हो जाएगी पाशवता ?


पन्त जी चाहते थे संसार से विषमता मिट जाये धरती फिर मानव के रहने योग्य बन जाये, ज्यादा मानवीय हो जाये. धरा पर स्वर्ग आये, स्वर्ग मानव के भीतर ही है, उसे बाहर उतारना है. यह युग परिवर्तन का युग है, जैसे बसन्त से पहले पतझड़ आता है, वैसे ही आज पुराने मूल्य विघटित हो रहे हैं, एक नवीन युग आ रहा है. उनकी कविता ‘आओ, हम अपना मन टोवें’  कविता में कवि मानव को मन की निर्धनता से मुक्त होने की बात कहता है, स्वार्थ रहित मन ही अपने व औरों के जीवन को सुंदर बना सकता है. 


आओ, अपने मन को टोवें!

व्यर्थ देह के सँग मन की भी

निर्धनता का बोझ न ढोवें।


जाति पाँतियों में बहु बट कर 

सामाजिक जीवन संकट वर,

स्वार्थ लिप्त रह, सर्व श्रेय के

पथ में हम मत काँटे बोवें!


अंत में कवि की अनुपम कृति कला और बूढा चाँद में प्रकाशित इस अनुपम रचना का आनंद लें, जिसमें प्रेम की इतनी सजीव परिभाषा दी गयी है. 

प्रेम

मैंने

गुलाब की

मौन शोभा को देखा ।


उससे विनती की

तुम अपनी

अनिमेष सुषमा की

शुभ्र गहराइयों का रहस्य

मेरे मन की आँखों में

खोलो ।


मैं अवाकू रह गया ।

वह सजीव प्रेम था ।


मैंने सूँघा,

वह उन्मुक्त प्रेम था ।

मेरा ह्रदय

असीम माधुर्य से भर गया ।


मैंने

गुलाब को

आठों से लगाया ।

उसका सौकुमार्य

शुभ्र अशरीरी प्रेम था ।


रविवार, सितंबर 6

अमर स्पर्श -3

अमर स्पर्श

गतांक से आगे

आधुनिक काव्य की भूमिका में पन्त जी लिखते हैं कि ’’कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति निरीक्षण से मिली है, जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि प्रदेश को है। मैं घण्टों एकान्त में बैठा प्राकृतिक दृश्यों को एकटक देखा करता था और कोई अज्ञात आकर्षक मेरे भीतर एक अव्यक्त सौन्दर्य का जाल बुनकर मेरी चेतना को तन्मय कर देता था।’’वह कविता को सौंदर्य की प्रतिनिधि मानते हैं और कहते हैं कि हिमालय में पैदा होने के कारण सौंदर्य तो उनके घर का मेहमान था. उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। गाँधी जी से प्रभावित होकर स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का अध्ययन करने लगे। इलाहाबाद में ही उनकी काव्यचेतना का विकास हुआ। प्रकृति के सुंदर रूप का चित्रण जिस तरह उन्होंने अपनी कविताओं में किया है, छायावाद का कोई अन्य कवि उस ऊँचाई तक नहीं पहुँच सका। उन्हें प्रकृति के सुकुमार कवि भी कहा जाता है. उनकी प्रसिद्ध कविता ‘यह धरती कितना देती है’ को पढ़कर किसका हृदय आह्लाद से न भर जायेगा. उसी कविता का एक अंश - 

अनगिनती पत्तों से लद, भर गयी झाड़ियां,

हरे-भरे टंग गये कई मखमली चंदोवे!

बेलें फैल गयी बल खा, आंगन में लहरा,

और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का

हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को,-

मैं अवाक् रह गया-वंश कैसे बढ़ता है!

छोटे तारों-से छितरे, फूलों के छीटे

झागों-से लिपटे लहरों श्यामल लतरों पर

सुन्दर लगते थे, मावस के हंसमुख नभ-से,

चोटी के मोती-से, आंचल के बूटों-से!

ओह, समय पर उनमें कितनी फलियां फूटी!

कितनी सारी फलियां, कितनी प्यारी फलियां,-

पतली चौड़ी फलियां! उफ उनकी क्या गिनती!

लम्बी-लम्बी अंगुलियों - सी नन्हीं-नन्हीं

तलवारों-सी पन्ने के प्यारे हारों-सी,

झूठ न समझे चन्द्र कलाओं-सी नित बढ़ती,

सच्चे मोती की लड़ियों-सी, ढेर-ढेर खिल

झुण्ड-झुण्ड झिलमिलकर कचपचिया तारों-सी!

आह इतनी फलियां टूटी, जाड़ों भर खाईं,

सुबह शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस पास के

जाने-अनजाने सब लोगों में बंटवाईं !

 

शनिवार, सितंबर 5

शिक्षक दिवस पर शुभकामनायें

शिक्षा की जो ज्योति जलाते

आज करें अभिनन्दन उनका 

शिक्षा की जो ज्योति जलाते, 

बन्द पड़े हैं स्कूल किन्तु वे 

ऑन लाइन ही क्लास लगाते !

 

स्वयं सीखकर मनोयोग से 

बांट रहे हैं ज्ञान शिष्य को, 

हर घर ही इक स्कूल बना है 

नमन करें हम उनके श्रम को !

 

पुस्तक में तो सभी लिखा है 

विद्यार्थी अबोध अभी हैं, 

सरल शब्द में पाठ पढ़ा वे  

नव विचार प्रस्तुत करते हैं !

 

नयी नीति भी अपनाएंगे 

सदा सीखने को हैं तत्पर, 

उत्साही स्नेहिल अंतर है 

भारत बढ़े उन्नति पथ पर !

 

मार्ग दिखाते बने आदर्श 

शिक्षक की पहचान यही है, 

शिष्य छिपा है उसके भीतर 

हर समाज का मान वही है !

 

 

 

शुक्रवार, सितंबर 4

अमर स्पर्श


अमर स्पर्श 

गतांक से आगे

आस्था और समर्पण के चरम क्षणों में कवि को अस्तित्त्व और स्वयं के मध्य जैसे कोई भेद जान नहीं पड़ता, जगत का स्वप्नवत रूप उसे प्रकट होता है और वह कह उठता है -

ओ अंतरमयि,

तुम्हारा करुणा कर ही

ध्यान बन कर

गति हीन गति से

मुझे खींचता है ।


अपने स्थान पर

मैं तुम्हें पाता हूँ ।


मन के मौन श्रृंगों पर

सुनहले क्षितिज

नव सूर्योदय की प्रतीक्षा में हैं ।


शुभ्र

अवाक्

आत्मोदय की ।

ओ विराट, चैतन्य

यह मैं क्या देखता हूँ


कि घर बाग पेड़

और मनुष्य

किसी अदृश्य पट में

चित्रित भर हैं ।

ये वास्तविक सत्य नहीं,

मोम के पुतले भर हैं ।’’


जीवन के जिन मूलभूत प्रश्नों का हल मानव सदा से खोजता रहा है, कवि पंत ने कितनी सरलता से श्रद्धा और भक्ति के भावों में उन्हें व्यक्त कर दिया है -


क्यों रहे न जीवन में सुख-दुख

क्यों जन्म-मृत्यु से चित्त विमुख?

तुम रहो दृगों के जो सम्मुख

प्रिय हो मुझको भ्रम, भय, संशय !


तन में आएँ शैशव यौवन

मन में हों विरह मिलन के व्रण,

युग स्थितियों से प्रेरित जीवन

उर रहे प्रीति में चिर तन्मय!


जो नित्य अनित्य जगत का क्रम

वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,

हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,

जग से परिचय, तुमसे परिणय !


तुम सुंदर से बन अति सुंदर

आओ अंतर में अंतरतर,

तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर

वरदान, पराजय हो निश्चय !


कवि के जीवन और काव्य कर्म के बारे में जानने की इच्छा स्वाभाविक थी. ज्ञात हुआ, जन्म के कुछ घण्टे बाद ही माँ का साया उनके सिर से उठ गया था. दादी ने उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया.सबसे छोटे होने के कारण परिवार में सभी का स्नेह मिला किन्तु माँ के प्रेम का अभाव उन्हें प्रकृति के सान्निध्य में ले गया. सलेटी छतों वाले पहाड़ी घर, आंगन के सामने आडू, खुबानी के पेड़, पक्षियों का कलरव, सर्पिल पगडण्डियां, बांज, बुरांश व चीड़ के पेड़ों की बयार व नीचे दूर दूर तक मखमली कालीन सी पसरी कत्यूर घाटी व उसके ऊपर हिमालय  के उत्तंग शिखरों और दादी से सुनी कहानियों  व शाम के समय सुनायी देने वाली आरती की स्वर लहरियों ने इस बालक को बचपन से ही कवि हृदय बना दिया था।

क्रमशः