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शुक्रवार, जून 26

करीब उसके खुदा होता है



करीब उसके ख़ुदा होता है


 

जो भी ‘खुद’ से जुदा होता है

करीब उसके खुदा होता है

 

बनी रहेगी जब तक भी ‘खुदी’

 मिलन किसी से कहाँ होता है


अभी मिलन फिर बिछड़ना खुद से

तब ‘उसका’ सिलसिला होता है

 

उलट दो ‘खुद’ बन जाता है ‘दुख’

 अरूप  रूबरू  तब होता है


सुख के पीछे खड़ा था खुस(खुश) 

 सुकून जिसके निकट होता है

 

माया हर्फों की जहां सारा

‘चुप’ में वह रब बसा होता है


 करीब वही है सबसे उसके

  दिल में जिसके फना होता है


 

बुधवार, मार्च 22

वही ख़ुदा उनमें भी बसता है उतना ही



वही ख़ुदा उनमें भी बसता है उतना ही 


रोटी-कपड़े की फ़िक्र नहीं होती जिनको 

ख़ुदा की रहमत है कमी नहीं ज़रा उनको 


चंद निवालों के लिए दिन-रात खटते हैं 

कभी देखा भी है पसीना बहाते  उनको 


अपने हाथों से नई इमारतें गढ़ते 

जा बसें उनमें ख़्वाब भी नहीं आये जिनको 


वही ख़ुदा उनमें भी बसता है उतना ही 

बड़ी प्यारी सी हँसी है मेहनत कशों की 


रविवार, फ़रवरी 26

तू सबब है यहाँ

 
तू सबब है यहाँ

हर घड़ी ख़ास है 

तू मेरे पास है, 

भर रहा नित नयी 

हृदय में आस है !


तुझको देखा नहीं 

पर बता तो सही, 

प्रीत की धार यह 

बिन मिले ही बही !


तू सबब है यहाँ 

जगत सजदा करे, 

हे  माया पति 

रच दे पल में जहाँ, 


कोई जाने नहीं 

तू ही सबमें छिपा, 

खुद को पा कर बँधा 

नित छुड़ा ही रहा !


मन हुआ क़ैद हैं 

अपने ही जाल में, 

कैसे छोड़ेगा तू 

हमें निज हाल में !


इल्म देता हुआ 

सदा रस्ता दिखा, 

ले चले है हमें

 प्यारा रहबर ख़ुदा !

मंगलवार, अक्टूबर 19

इतिहास बार-बार दोहराता है स्वयं को

इतिहास बार-बार दोहराता है स्वयं को 

मंदिर तोड़े जा रहे हैं 

खंडित हो रही हैं मूर्तियाँ 

धर्म के नाम पर अत्याचार और हैवानियत का 

एक बार फिर प्रदर्शन है 

जाने यह कैसा विचित्र दर्शन है 

जिसमें दूरियाँ पाटी नहीं जा सकीं 

शताब्दियों में भी 

एक अंधी मानसिकता पनप रही है 

जो असहिष्णु तो है ही 

मान लिया लिया है जिसने स्वयं को श्रेष्ठ 

जो धर्म आदमी में ख़ुदा नहीं देख पाता 

वह कैसे राह दिखाएगा 

अबोध भेड़ों की तरह जिधर चाहे कोई भी

 हांकता हुआ ले जाता है 

जियो और जीने दो का मंत्र नहीं आता जिसे

 देखें, वह कब तक स्वयं को बचा पाता है !


सोमवार, जुलाई 12

चंद ख़्याल


चंद ख़्याल 



पाया हुआ है सब जो खोजते हैं हम 
शब्दों में ज्ञान बसता दिल का था भरम 
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जाना हुआ सभी कहता है छोटा मन 
कोई कमी नहीं तो फिर क्यों करे जतन 
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छोड़ा यहाँ बाँधा वहाँ 
मुक्ति से डरता है जहां 
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मुश्किलों से डर जो ख़ुदा के द्वार आए 
पाए नहीं उसे बस पीड़ा को बढ़ाए 
-
स्वप्नों में भयभीत हुआ मन 
सीमाओं में खुद को बाँधा 
  कहीं नहीं थी कोई सीमा
जब भी आँख खोल कर देखा