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शुक्रवार, जून 26

प्रकाश और अंधकार

प्रकाश और अंधकार 

अंधकार  की एक लम्बी श्रृंखला... 
प्रकाश मिल मिलकर भी खो जाता है, 
युगों से इस जगत रूपी सुरंग में चलते हुए 
निकास द्वार कहीं नजर नहीं आता है !

खुला आकाश निमन्त्रण देता 
धरा से पाँव बंधे हैं 
मुक्ति का गीत मन गाए भी 
पर, बंद पिंजरे में ही 
पंख फड़फड़ाता है !

‘मैं’ का होना ही अँधेरा 
‘तू’ ही प्रकाश पुंज घनेरा 
तेरे प्रकाश की ही छाया है यह जग
तुझसे ही जीवन पाता है !

अँधेरा भी प्रकाश के बल पर इतराता 
लुप्त होता पल में 
उसके आने पर
मन यही भेद ही तो बेखुदी में 
अक्सर भूल जाता है !

रविवार, फ़रवरी 10

जाने कितने पर्वत नापे


जाने कितने पर्वत नापे


अनगिन बार खिलाये उपवन,
कंटक अनगिन बार चुभे हैं,
जाने कितने पर्वत नापे
कितनी लहरों संग तिरे हैं !

मंजिल अनजानी ही रहती
द्वार न उसका खुलता दिखता,
एक चक्र में डोले जीवन
सार कहीं ना जिसका मिलता !

बार-बार इस जग में आकर
दांवपेंच लड़ाए होंगे,
अंधकार में ठोकर खाकर
फिर-फिर नैन गँवाए होंगे !

भय भीत पर खड़ा है जीवन
कैसे मन को विश्राम मिले,  
सत्य से आँख मिले न जब तक
क्योंकर अंतर में राम मिले !


बुधवार, जून 6

सागर तपता है


सागर तपता है

सागर तपता है
और बनकर मेघ शीतल
डोलता है संग पवन के
बरस जाता है तप्त भूमि पर..
मन अंतर तपता है
और बनकर करुणा अनंत
डोलता हैं संग प्रेम के
बरस जाता है तप्त हृदयों पर..
विचारों को सच की आग में तपाना होगा
निखारना होगा भावनाओं को
उस भट्टी में
जहाँ सारे अशुभ जल जाते हैं  
न जाने कितने जन्मों की मैल
घुल गयी है मन के अनमोल पानी में
उसे तपाकर भाप बनकर उड़ना ही होगा ऊपर..
ऊर्जा पावन होकर ही बरसेगी
बनकर करुणा जल
मिटेगा अंधकार सदियों का
जब आत्मज्योति का पुष्प खिलेगा उस जल में
प्रीत की पवन बहेगी
उस पुष्प की महक
बिखरेगी चहुँ दिशाओं में
तपाये बिना जीवन का कोई रूप नहीं ढलता
तपाये बिना अहंकार नहीं पिघलता
सद्गुरू के चरणों में अहंकार ही चढ़ाना है
बार-बार अपने मन को यही एक अध्याय पढ़ाना है !
सुख की चाहत और दुःख के भय ने
कितना रुलाया है
स्वयं के कुछ बनने के
प्रयास ने कितना सताया है
अब बंद करना है यह खेल सदा के लिये
जीवन का आभार इस बोध उपहार के लिए !  

सोमवार, मई 29

आँसू बनकर वही झर गया


आँसू बनकर वही झर गया


दुःख की नगरी में जा पहुँचे,
निकले थे सुख की तलाश में, 
अंधकार से भरे नयन हैं  
खोल दिये जब भी प्रकाश में ! 

फूल जान जिसे कंठ लगाया, 
काँटे बनकर वही बिँध गया,  
अधरों पर जो मिलन गीत था 
आँसू बनकर वही झर गया !

तलविहीन कूआं था कोई 
 किया समर्पित हृदय जिस द्वार,
जहाँ उड़ेला भाव प्रीत का 
पाषाण की निकली दीवार ! 

स्वप्न भरे थे जिस अंतर में,
सूना सा वह बना खंडहर
बात बिगड़ती बनते-बनते, 
दिल में पीड़ा बहे निरंतर ! 


मंगलवार, अक्टूबर 28

पंछी उड़ जायेगा इक दिन


पंछी उड़ जायेगा इक दिन



कौन रुकेगा यहाँ व कब तक
देर नहीं, टूटेगा पिंजरा,
पंछी उड़ जायेगा इक दिन
कभी न देखा जिसका चेहरा !

उस पंछी को मीत बना ले
वही अमरता को पाता है,
लहर मिटी सागर न मिटता
जीवन सदा बहा करता है !

उससे जिसने लगन लगाई
ठहरा जो पल भर भी उसमें,
अमृत पाया अपने भीतर
मिटा बीज जीया अंकुर में !

खो जायेगा इक पल सब कुछ
अंधकार ही सन्मुख होगा,
बना साक्षी मुस्काता जो  
तब भी कोई शेष रहेगा !

खुद से पार खड़ा जो हर पल
उससे ही पहचान बना लें,
तृषा जगे उससे मिलने की
प्रीति बेल सरसे जीवन में !



रविवार, अक्टूबर 13

बहे उजाला मद्धिम-मद्धिम

बहे उजाला मद्धिम-मद्धिम


बरस रहा है कोई अविरत
 झर-झर झर-झर, झर-झर झर-झर
भीग रहा न कोई लेकिन
ढूँढे जाता सरवर, पोखर !

प्रीत गगरिया छलक रही है
 युगों-युगों से सर-सर सर-सर,
प्यासे कंठ न पीते लेकिन
 अकुलाये से खोजें निर्झर !

ज्योति कोई जले निरंतर
बहे उजाला मद्धिम-मद्धिम,
राह टटोले नहीं मिले पर  
अंधकार में टकराते हम !

मंगलवार, जुलाई 16

अग्नि एक संकल्प की जगे

अग्नि एक संकल्प की जगे




जाना है दूर अति सुदूर
पावों में पड़ी हैं बेड़ियाँ ,
कांटे बिखरे कदम-कदम पर
पुकारतीं किन्तु रण भेरियां !

एक युद्ध लड़ा जाना है
यात्रा इक आमन्त्रण देती,
आरोहण उच्च आकांक्षा का
ज्योति एक निमन्त्रण देती !

एक लक्ष्य साधना है पावन
‘कुछ’ तो अनावृत करना है,
नन्हे-नन्हे स्फुलिंगों से  
मन का अंधकार भरना है !

चमकीले रंगो वाले कुछ
जगत अनोखे कहीं छिपे हैं,
आओ उनको ढूँढ़ निकालें
छाया जिनकी यहीं कहीं है !

 दस्यु छिपे हैं अंधकार में
छिप कर वार किया करते,
निर्मल मन के शीतल जल में
विष की धार भरा करते !

अग्नि एक संकल्प की जगे
ज्योति प्रखर रोशन सब कर दे
एक ऊष्मा अमर प्रेम की
प्रज्ज्वलित कण-कण नभ तक कर दे