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सोमवार, जून 30

नीलगगन सा जो असीम है

नीलगगन सा जो असीम है


शब्दों से आहत होता मन 

शब्दों की सीमा कब जाने,

शब्द जहाँ तक जा सकते हैं 

मात्र वही स्वयं को जाने ! 


नीलगगन सा जो असीम है 

अंतर का आकाश न देखा, 

दिल को रोका चट्टानों से 

खिंच गयी जिन पर दुख रेखा ! 


एक ऊर्जा हैं अनाम सभी

क्योंकर इतना मोह नाम से, 

नाम-रूप बस छायायें हैं 

बिछड़ गयीं जो परम धाम से !


वैखरी, मध्यमा, पश्यंती  

के पार परावाणी बसती, 

माँ शारदा नित्य महिमा में 

वीणा हाथ में ले  विहँसती ! 


मंगलवार, नवंबर 15

किंतु न जब तक आया मानव

 किंतु न जब तक आया मानव 

पग-पग पर बलिहारी अंतर 

कण-कण में छवि सरस समायी, 

जाने कब तू उतरा नभ से 

कैसे पावन धरा बनायी !


पाहन, धूलि, पठार जहाँ तक 

 निहारती हैं निगाहें दृश्य, 

पादप, पेड़, नदी, निर्झर में 

अन्तर्हित वह अनाम अदृश्य ! 


मीन, कीट, सरिसर्प अनोखे 

खग, मृग, हरि, शावक, सिंहनियाँ,  

भाँति-भाँति के कुसुम खिले हैं 

तितली, अलि, अलिंद, मधुकरियाँ !


किंतु न जब तक आया मानव 

सृष्टि अधूरी सी लगती थी, 

दिव्य चेतना रही तिरोहित 

मन, मेधा उसमें जगती थी !


मन से जन्म हुआ मानव का 

श्रेष्ठ बुद्धि का है अधिकारी 

किंतु डुबाता अहंकार जब

मानस  रहा नहीं अविकारी !