परमात्मा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
परमात्मा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, जून 19

ऊर्जा

ऊर्जा 


ऊर्जा बहुत है, कर्म  कम 

ऊर्जा अहंकार बन जाएगी 

ऊर्जा कम है, कर्म अधिक 

ऊर्जा तनाव बन जाएगी 


ऊर्जा अति है कर्म भी अति 

ऊर्जा संतुष्टि बन जाएगी 

ऊर्जा अनंत है कर्म अति या अल्प

ऊर्जा आनंद बन जाएगी 


अधिक हो धन-दौलत तो 

अभिमानी हो जाता है आदमी 

कम हो धन तो तनाव से भर जाता है 

संपन्नता भी हो और श्रम भी जीवन में 

संतोष से भर जाता है 

किंतु धन बेहिसाब हो फिर भी 

 सदा खुश नहीं रह पाता 

इसलिए ऊर्जा क़ीमती है धन से 

ऊर्जा अर्थात आत्मा 

आत्मा अर्थात परमात्मा 

परमात्मा अर्थात सत्य, प्रेम और शांति ! 


बुधवार, अगस्त 16

जीवन - एक रहस्य

जीवन - एक रहस्य 



सब कुछ व्यवस्थित हो जीवन में 

नपा-तुला, मन के मुताबिक़ 

ऐसा कहाँ होता है ! 

अचानक घट जाता है कुछ 

भर जाता है जो अंतर में असंतोष 

परमात्मा हमें सुलाये रखना नहीं 

जगाये रखना चाहते हैं 

दो पैरों पर खड़े रहें सदा 

तकते आकाश को 

ऐसा उजकाये रखना चाहते हैं ! 

जीवन एक सीधी रेखा पर नहीं 

ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने का नाम है 

यहाँ रुक गया जो 

थक जाता है 

चलने वाले को ही विश्राम है !

अनंत है वह 

हम वही हैं यदि 

तो अनंत ही हमारी सीमा है 

सजग रहे अंतर, इसमें ही उसकी गरिमा है 

जो करणीय है 

वह करवा ही लेता है 

प्राप्य है जो दिला देता 

फिर कैसा द्वन्द्व और कैसा अभिमान 

जीवन एक रहस्य है 

लें ऐसा ही मान ! 


बुधवार, जून 9

अनादि -अनंत

अनादि -अनंत 

चाहे कितना भी हो विघटन 

समाज बंटे, टूटे परिवार

व्यक्ति रह जाए अकेला 

पर सदा साथ रहती है उसके 

एक अखंड आत्मा !

चाहे व्यक्तित्व बंटा हो 

मन बिखरा हो 

भीतर भीड़ नज़र आती हो 

पर सदा साथ रहता है एक परमात्मा 

नहीं,  यहाँ कभी कोई हानि नहीं होती 

फूल आज झरता है 

कल एक नयी कली जन्म लेती है 

सभ्यताएँ नष्ट होती हैं 

फिर नई पनपने लगती हैं 

यह एक अनंत प्रक्रिया है 

नहीं, भय की कोई बात नहीं 

हम सदा ही सुरक्षित हाथों में हैं 

ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती न ही पदार्थ 

वे रूप बदलते हैं एक दूसरे में !


बुधवार, जून 24

योगी

योगी 

प्रमाद की नींद पर 
कभी सुदिन खड़ा नहीं होता 
यह सही है, जब जाग जाए मन 
तभी उसके लिए सवेरा होता !

वे  विलग हैं,अनोखे हैं 
 स्वार्थ उन्हें नहीं चलाता
उनकी ऊर्जा का स्रोत अहंकार से नहीं 
परमात्मा से है आता !

भय से भाग खड़े हों
या क्रोध से करें सामना 
यह सामान्य जन करते होंगे 
विपदा आने पर, 
वे योगारूढ़ हो 
शांत मन से करते हैं मुकाबला 
भीतर ठहर कर !

न लाभ की चिंता है उन्हें 
लोभ नहीं डुलाता
निमित्त बने हैं किसी के, कर्ता वही है 
 उसका काम करना भाता !

ध्यान और समर्पण की गंगा 
जहाँ दिन-रात बहती है, 
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के पीछे 
तुरीया स्वतः ही रहस्य खोल देती है !
अँधेरे में जग जल रहा हो 
जब अज्ञान के हाथों 
ज्ञान की आँख ही उसको 
बचा सकती है !  

गुरुवार, मई 28

शिशु भाव में कोई मानव

शिशु भाव में कोई मानव


नन्हा शिशु निःशंक हो जाता 
माँ के आँचल में आते ही ! 

जब से उसने आँखें खोलीं 
सम्मुख उसे खड़ा ही पाया,
साधन बनी मिलन का जग से
सब से परिचय था करवाया !

बालक यदि सदा शिशुभाव में 
माँ का आश्रय लेकर रहता, 
व्यर्थ अनेकों उपद्रवों से
खुद को सदा बचाये रखता !

किन्तु उसका यह अबोध मन 
माँ से भी विद्रोह करेगा, 
जिसने उसको जन्माया है 
उस जननी पर क्रोध करेगा !

जिसने सदा ही सुहित चाहा  
उसकी आज्ञा ठुकरायेगा, 
निश्च्छल निर्मल प्रेम को उसके 
समझ देर से ही पायेगा !

चाहे कितनी देर हुई हो 
माँ का दिल प्रतीक्षा करता,
परमात्मा का प्रेम वहीं तो 
सहज विशुद्ध रूप में बसता !

शिशु भाव में कोई मानव 
जब मन्दिर के द्वारे जाता 
सदा भवधरण की बाँहों का 
खुला निमंत्रण वह पा जाता !



बुधवार, मई 20

सत्य क्या है


सत्य क्या है 


देह या आत्मा
जगत या परमात्मा
दुःख या सुख
दोनों या दोनों के परे ?

देह टिकती नहीं, है जगत निरंतर गतिमान, दुःख नहीं भाता
 आत्मा है शाश्वत, परमात्मा अटल, सुख सदा लुभाता  

जो है सदा, ध्रुव, और प्रिय
 हाँ, वह हो सकता है सत्य !

पर... यदि देह न हो तो आत्मा का ज्ञान नहीं होता
संसार न हो परमात्मा कहाँ मिलेगा 
दुःख न सहा हो तो सुख का मोल कौन जान सकेगा 

सो दोनों हैं सत्य !

देह और आत्मा के परे, ब्रह्म  
जगत व परमात्मा से परे, शून्य 
दुःख और सुख से परे, शांति 

 तब तो दोनों से परे भी है सत्य ! 


मंगलवार, अप्रैल 28

तू ही दाता

तू ही दाता


‘देने’ को कुछ न रहा हो शेष 
जब आदमी के पास 
तब कितना निरीह होता है वह ! 

देना ही उसे आदमी बनाये रखता है 
मांगना मरण समान है 
खो जाता जिसमें हर सम्मान है !
देना जारी रहे पर किसी को मांगना न पड़े 
ऐसी विधि सिखा रहा आज हिंदुस्तान है !

पिता जैसे देता है पुत्र को 
माँ  जैसे बांटती है अपनी सन्तानों को 
उसी प्रेम को भारत के जन-जन में प्रकट होना है 
ताकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ मानन वाली इस संस्कृति की 
बची रहे आन,आँच न आए उसे !

जहां अनुशासन और संयम 
केवल शब्द नहीं हैं शब्दकोश के 
यहां समर्पण और भक्ति
 कोरी धारणाएं नहीं हैं 
यहां परमात्मा को सिद्ध नहीं करना पड़ता 
वह विराजमान है घर-घर में 
कुलदेवी, ग्राम देवी और भारत माता के रूप में !

सोमवार, अप्रैल 27

हम और दुनिया

हम और दुनिया 


हम जैसे हैं, 
वैसे ही स्वीकार करे दुनिया 
चाहते हैं हम, 
क्योंकि बदलना हमें भाता नहीं 
इसमें श्रम लगता है, खुद को तराशना पड़ता है 
जो हमें  आता नहीं !
अपनी भूलें भी सहज लगती हैं 
आखिर वे किसी का क्या बिगाड़ती  हैं ?
पर... दुनिया को तो बदलना होगा 
हमारी ख्वाहिश यही है !
वहां असत्य है ( जैसे कि हम सत्य के अवतार हैं )
वहां अन्याय है ( हम तो न्याय के पुजारी हैं )
वहां अधर्म है ( जैसे कि हम धर्म का पाठ पढ़कर ही जन्मे थे )
वहाँ हमें कोई समझता नहीं (जैसे हमने हर किसी को समझने का प्रयास कर ही लिया है )
हम स्वीकारते हैं स्वयं को सारी भूलों सहित 
तो क्यों न स्वीकार लें जगत को जैसा वह है !
परमात्मा हर जगह उतना ही समाया है 
जिसे वह कमल और कीचड़ दोनों में नजर आया है 
वह जानता है
 कमल खिल नहीं सकता बिना कीचड़ के 
हाँ, उससे ऊपर उठता है जो 
वह यह राज देख पाता है 
धर्म-अधर्म दोनों के परे जाकर ही 
कोई उस एक से जुड़ पाता है !

मंगलवार, अप्रैल 25

एक लघु कहानी

एक लघु कहानी


कल रात्रि पुनः स्वप्न में उसे वही स्वर्ण कंगन दिखा, साथ ही दिखी मारिया की उदास सूरत. वह झटके से उठकर बैठ गयी. एक बार उसने ईश्वर से प्रार्थना की और मन ही मन मारिया से भी क्षमा मांगी,  “नहीं, उसे उस पर जरा भी संदेह नहीं है कि उसका कीमती आभूषण उसने चुराया है.” उसे याद आया, हफ्ता भर पहले की ही तो बात है. दो दिनों के एक कोर्स के लिए उसे बाहर जाना था. सुबह-सुबह योगासन के समय उसने दोनों कंगन उतारकर कालीन पर रख दिए थे, जिन्हें रोज ही उठते समय वह पहन लिया करती थी. उस दिन न जाने किस जल्दी में वह उन्हें उठाना भूल गयी. दूसरे दिन कोर्स समाप्त होने पर उन्हें एक भोज में भी सम्मिलित होना था, जिसमें पहनने के लिए पोशाक तथा मैचिंग आभूषण वह पहले ही रख चुकी थी. सम्भवतः यही कारण रहा होगा कि उसे कंगनों का ख्याल नहीं आया और बहुत बाद में जब याद आया तो उसने बेटी को से कहा, वह उन्हें कार्पेट से उठाकर सम्भालकर रख दे. दो दिन बाद घर लौटी तो उसने इस बारे में पूछा, बेटी ने कहा उसे कालीन पर वे नहीं मिले. पतिदेव ने बारीकी से हर तरफ खोज शुरू की तो एक कंगन मिल गया, पर दूसरा नदारद था. अब उसका माथा ठनका, एक कंगन है तो दूसरा कहाँ गया. एक बाहर है तो दूसरा आलमारी या गहनों के डब्बे में कैसे जा सकता है ? यह सोचकर सारे कमरे में खोज जारी रखी पर कंगन को नहीं मिलना था, नहीं मिला.

उस दिन घर में मारिया आई थी. जो पूरे घर की सफाई करती थी. मन में एक संदेह उठा शायद उसने पड़ा देखा हो और..आज तक कभी ऐसा हुआ तो नहीं था. बेटी ने कहा भी, “इस तरह आप किसी पर इल्जाम कैसे लगा सकती हैं ?” पतिदेव ने कहा, “कितने का रहा होगा, क्यों इतना परेशान होती हो”, पर उसे लग रहा था, कितना बड़ा नुकसान हो गया, वह भी घर बैठे. पढ़ाई में भी उसका मन नहीं लग रहा था. इसी मनःस्थिति में उसने उस दफ्तर में फोन कर दिया जहाँ से मारिया को काम पर भेजा जाता था. उसने उन्हें शांत स्वरों में कहा, घर से एक कीमती वस्तु खो गयी है, उन्हें मारिया पर जरा भी संदेह नहीं है, पर वे ही बताएं कि क्या करना चाहिए. वहाँ से संदेश आया, वे मारिया को भेज रहे हैं, वह तलाशने में मदद करेगी. पर कोई फायदा नहीं हुआ. मारिया का उदास चेहरा और परेशान करने लगा. ऐसा लगा जैसे अपना दुःख उसके काँधों पर डालकर दुःख को दुगना कर लिया है. इसी तरह दस दिन बीत गये, एकाएक ख्याल आया, क्यों न अपने शेष आभूषण भी सहेज ले, सब सही सलामत तो हैं. जैसे ही वह सूटकेस खोला जिसमें फाइलों के नीचे आभूषण का डब्बा था, एक फ़ाइल के ऊपर ही पड़ा था वह कंगन.. उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं. यह कोई चमत्कार ही लग रहा था. शायद उस दिन अनजाने में उसने सूटकेस खोलकर उन्हें रखना चाहा होगा, जल्दी में एक नीचे गिर गया और एक भीतर...दिल से बोझ उतर गया, परमात्मा के प्रति धन्यवाद का भाव भी जगा. मरिया का ध्यान आया, वह यह समाचार सुनकर कितनी खुश होगी.

मारिया आज सोचकर आयी थी कि यदि कंगन नहीं मिला तो वह काम छोड़ देगी. पिछले दस दिनों से कोई दिन ऐसा नहीं गया था जिस दिन उसने कंगन के मिल जाने के लिए खुदा से प्रार्थना न की हो. वह नियमित चर्च जाती है और बचपन से ही अल्लाह के रास्ते पर चलकर अपने ईमान पर टिकी रही है. कितने ही बड़े-बड़े घरों में उसने काम किया है जहाँ कीमती सामान रखकर मालकिन स्नान करने चली जाती थीं. जहाँ आभूषण यूँ ही पड़े रहते थे पर कभी उसके मन में ख्याल भी नहीं आया, फिर इस घर में भी वह कई महीनों से आ रही है. छोटा सा हँसमुख परिवार है, मालकिन किसी परीक्षा के लिए पढ़ाई कर रही हैं. सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन उनका एक कंगन खो गया, ‘खोना’ और ‘चोरी होना’ में कितना अंतर है, और जब उसके एजेंट ने उससे यहाँ आकर खोजने के लिए कहा तो वह ख़ुशी-ख़ुशी आ गयी थी. पर यहाँ आकर घर वालों के व्यवहार से लगा कि उन्हें उस पर संदेह है और एक दिन जब जब उसने अतिरिक्त काम के लिए मना कर दिया, क्योंकि उसका ड्राइवर बाहर आ गया था, तो साहब का पारा चढ़ गया. पहले भी उसने समय न होने पर काम के लिए मना किया था पर ऐसा कभी नहीं हुआ था. घर आकर वह फूट-फूट कर रोई, क्या उन जैसों का कोई सम्मान नहीं होता, कहीं काम करने का अर्थ यह तो नहीं कि उन पर इतना भी विश्वास न किया जा सके. उसने निश्चय कर लिया अगली बार उन्हें  साफ-साफ कह देगी कि अब यहाँ काम नहीं कर सकती.


उसके लिए आज ख़ुशी का दिन था. उसे लग रहा था मारिया भी यह खबर सुनकर खुश हो जाएगी और वह सब कुछ पल में भुला देगी, पर ऐसा नहीं हुआ. विषाद के जो बीज उन्होंने दस दिनों में बोये थे उसकी फसल भी उन्हें ही काटनी थी. मारिया ने जैसे ही ये शब्द सुने, “मिल गया”..उसकी आँखों से आंसू झरने लगे और कुछ ही देर में वह फूट-फूट कर रोने लगी. वह उसे देखती रही फिर गले से लगा लिया. क्षमा मांगी पर उसके आंसूओं का जैसे बाँध ही टूट गया था. वह कुछ देर बाद शांत हुई तो उसका खुद का मन अब उदासी की छाया से घिर गया था. पिछली बार जब वह आई थी तो उसने पूछा था, “आपको मुझपर संदेह है ?” तो उसने कहा था, “नहीं, पर मैं उदास हूँ” मुझे दुःख है कि मेरा इतना कीमती सामान खो गया है.” उस दिन भी उसे दुःख हुआ होगा पर तब उसके पास यह देखने की फुर्सत कहाँ थी. आज उसका चेहरा देखकर खुद पर क्रोध आ रहा है, इसकी जिम्मेदार वह ही तो है. उसकी लापरवाही की सजा इसे व्यर्थ ही भोगनी पड़ी, उसके लोभ की सजा भी, स्वर्ण आभूषणों के प्रति उसकी आसक्ति की सजा भी. कितने आभूषण पड़े हैं जिन्हें वर्ष भर में एक बार भी पहनने का अवसर नहीं आता. परमात्मा का दिया सब कुछ है. यदि वास्तव में ही कोई वस्तु गुम हो जाये तो उसके लिए मन के चैन को खोना क्या उचित है ? और कितनी सरलता से वे घरों में काम करने वालों पर संदेह करने लगते हैं, उन्हें सम्मान न दें पर अपमान करने का क्या हक है उन्हें ? उसने एक बार फिर मारिया को गले से लगाया और भरे गले से क्षमा मांगी. 

गुरुवार, मार्च 9

एक दिन



एक दिन


एक दिन आएगा  
जब सही अर्थों में समान होंगे हम 
परमात्मा की ज्योति से दीप्त 
मनु और शतरूपा की भांति 
एक समान आवश्यक 
उसे जन्माने में 
पंछी के दो परों की भांति 
जीवन के हर द्वंद्व की भांति 
अपरिहार्य एक से 
नहीं होगी कोई प्रतिद्वंद्वता 
न कोई स्पर्धा 
न कोई छोटा और बड़ा 
जीवन के पथ पर संग-संग कदम बढ़ाते 
दो मित्रों की भांति हम लिखेंगे 
भविष्य की नई पीढ़ियों का भाग्य 
निज संस्कारों से पोषित करेंगे 
उनकी अछूती कोमल निष्पाप आत्माएं 
एक दिन आयेगा 
जब हम पुनः मिलेंगे 
समान स्तर पर 
न कोई अनुगामी होगा 
न पीछे चलेगा छाया बनकर 
साथ-साथ होकर भी हम 
नहीं खोएंगे अपनी अस्मिताएं 
सृजन करेंगे मूल्यों और दीर्घकालिक परंपराओं का  
जो कभी गीत और कभी नृत्य बनकर 
जीवित रखेंगी हमारी स्मृतियों को ! 

शुक्रवार, जनवरी 20

तब



तब 

जब मन ही मन है भीतर 
  एक पहेली सा
भरमाता है जीवन
खो जाता है जब मन
आत्मा के सान्निध्य में  
 बन जाता है  क्रीड़ांगण
आत्मा भी जब चकित हुई सी 
तकती है अस्तित्व को 
परमात्मा जग जाता है 
 खिल उठता है वृन्दावन 
 परमात्मा भी निहार जिसे  
 जब मुग्ध हुआ हो 
तब ?

गुरुवार, दिसंबर 10

सुबह की सैर

सुबह की सैर


बाहर निकलो
 न झांको खिडकियों से
घरों में बैठ-बैठे
दुनिया बहुत बड़ी है बाहर
खुला आसमान है
सुंदर कितना यह जहान है
हजारों मील का सफर तय कर आये
पंछियों की सोचो न
 चार कदम चल कर
बगीचे की सैर ही कर आओ
थोडा चम्पा को निहारो
चमेली, गुलाब, गेंदा को सहलाओ
 पंछियों के झुण्ड को दाना डालो
उगते हुए सूरज की तस्वीर ही उतारो
बाहर जीवन बदल रहा है प्रतिपल
घट रहा है परमात्मा का नृत्य
अनदेखा, अनजाना पत्ते-पत्ते में अविकल   
जन्मते हजारों पादप इस धरा पर निरंतर
उलेचती ही जाती है भूदेवी
रंगों का अकूत खजाना
नहीं चलेगा अब
घर में बंद रहने का कोई बहाना !  

  

गुरुवार, फ़रवरी 26

वह हँसी

वह हँसी


परमात्मा सबसे बड़ा विदूषक है
वह जिसे कहते हैं न हंसोड़ !
उसने पट्टी बाँध दी है आँखों पर
और छोड़ दिया है स्वयं को खोजने के काम में
कभी कोई खोल देता है आवरण
तो खिलखिला कर हँस देता है
व्यर्थ के जंजाल से उबर कर
 वही चैन की नींद सोता है

छ्न्न से फूट पडती है हँसी
जब स्वप्न से जग जाता है कोई रात आधी
हमीं थे जो खुद को दौड़ाए जा रहे थे
शेर बनकर खुद को खाए जा रहे थे
और दिन में जो स्वप्न बुने चले जाता है कोई
टूटें...तब भी ऐसा ही हँस देना होगा
जानता है जो... वही असल में जीता है


शनिवार, सितंबर 27

शुभकामना

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
आने वाले सभी पर्वों के लिए शुभकामना के साथ अगले दस-बारह दिनों के लिए विदा. आज ही हम बंगलुरु तथा कुर्ग की यात्रा पर जा रहे हैं. आशा है आप सभी के जीवन में विजयादशमी का उत्सव नई विजय की सूचना लेकर आएगा. परमात्मा हर क्षण हम सभी के साथ है.

अनिता 

शनिवार, अगस्त 30

साझीदार


साझीदार


परमात्मा को हटा दें तो
इस जगत में बचता ही क्या है ?
उसका ऐश्वर्य !
उसकी विभूतियाँ और अनंत साम्राज्य !
मानव चाहे तो बन सकता है
उसका साझीदार
अन्यथा रह सकता है मात्र पहरेदार !
चुनना है उसे
मान अपना निहारना
या पुकारना
(जैसे कि वह कहीं दूर हो)
भीतर झाँकते ही द्वार खुलने लगता है
जैसे जल में डोलती नौका को
 मिल जाता है आधार
अथवा तो कम्पित उर को
आश्वस्ति भरा स्वीकर
प्रेम को हटा दें तो
जीवन में बचता ही क्या है ?
उसका अपनापन ! आत्मीयता और दुलार !
उसका अनंत फैलाव
मानव चाहे तो खो सकता है
अपना अहंकार
अन्यथा करता रह सकता है
संबंधों में व्यापार !

शुक्रवार, अगस्त 8

स्वतंत्र हैं हम

स्वतंत्र हैं हम



यही सच है कि
अपने ही हाथों खोदे हैं
अपने मार्ग में हमने गड्ढे
गिर कर उनमें फिर पछताए हैं

हाँ, यही सच है
अपने ही कारण बार-बार
ठगे गये हैं हम जीवन के खेल में

जब हर तरफ ख़ुशी की
 बरसात हो रही थी
ओढ़ लिया था हमने ही मायूसी का छाता
जब परमात्मा सूर्य बनकर
चमचमा रहा था गगन में
हम छुप गये थे
गहन, गीली, संकरी कन्दराओं में
रेंगने को मजबूर  

जब हवाएं आकाश में डोलती फिरती थीं
हमने माटी के नीचे खोद ली थीं खंदके
और डर कर मौत से छुपते फिर रहे थे

हाँ, यह सच है
हम ही चूक गये हैं बार-बार
उस अनंत की यात्रा पर जाने से
हमने ही स्वर्ण पिंजरों में
चाह था कैद होना

जब पुकार लगाई जा रही थी
प्रातः समीरण के साथ मन्दिर
की घंटियों के संग आती
मधुर झंकार के रूप में
हम किसी गहरी नींद में सोये थे
उसी बेहोशी में शायद हमने ही
बीज बोये थे
अब जब नजर आते हैं
बबूल के जंगल अपने चारों ओर
तो याद आती हैं वह तंद्रालस से भरी सुबहें


यह भी सच है
अपने ही हाथों खड़े कर सकते हैं
हम सुवर्ण महल अपने चारों ओर
जहाँ सुनाई देता है दैवीय संगीत
और छाई है एक अपूर्व शांति की सुगंध
जहाँ से उठती हैं ऋचाएं और शंखनाद
जहाँ से बहती है प्रेम की अजस्र धारा
जहाँ मिलता है हर जीवन को
आश्रय आनंद पूर्ण
जहाँ से उगते हैं दिव्य कमल
जहाँ प्रीत है अतीव सुकोमल

सच दोनों हैं
चुनाव हमें करना है
अपने अन्तस् को हमें भरना है
जो चाहे कर लें
जो चाहे भर ले

स्वतंत्र हैं हम...