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शुक्रवार, दिसंबर 6

यज्ञ

यज्ञ 

एक यज्ञ चलता है बाहर 

शुभ कर्म बनें अगरु व चंदन, 

एक यज्ञ चलता है भीतर 

श्वासों में हो पल-पल सुमिरन !  


अग्नि वही समिधा भी वह है 

वेदी व ‘होता’ भी वही है, 

नव प्रेरणा उमंग ह्रदय की 

उलझ-पुलझ में वही सही है ! 


बरस रहा मेघ के संग जो 

नीर वही नदिया में बहता, 

तृषा बुझाता आकुल उर की 

अखिल विश्व को ढक कर रहता !


मंगलवार, अक्टूबर 11

यज्ञ भीतर चल रहा है

यज्ञ भीतर चल रहा है



श्वास समिधा बन सँवरती

प्रीत जगती की सुलगती,

मोह कितना छल रहा था

सहज सुख अब पल रहा है !


मंत्र भी गूजें अहर्निश

ज्योति माला है समर्पित,

कामना ज्वर जल रहा था

अहम मिथ्या गल रहा है !


अनवरत यह यज्ञ चलता

प्राण दीपक नित्य जलता,

पास न कुछ हल रहा था

उम्र सूरज ढल रहा है !


खोजता था मन युगों से

छला गया स्वर्ण मृगों से,

व्यर्थ भीतर मल रहा था

परम सत्य पल रहा है !


चाह थी नीले गगन की

मृत्यू देखी हर सपन की,

स्नेह घृत भी डल रहा था

द्वैत अब तो खल रहा है !


बुधवार, मार्च 30

जीवन मधुरिम काव्य परम का

जीवन मधुरिम काव्य परम का

फिरे सहज श्वासों की माला

हम भाव सुगंध बनें,

जीवन मधुरिम काव्य परम का

इक सरस प्रबंध बनें !

 

जगती के इस महायज्ञ में

आहुतियाँ अपनी हों,

निशदिन बंटता परम उजास

मेधा शक्ति ज्योति हो !

 

शब्द गूँजते कण-कण में नित

बाँचें ज्ञान ऋचाएं,

चेतन हो हर मन सुन जिसको

गीत वही गुंजायें !

 

शुभता का ही वरण सदा हो

सतत जागरण ऐसा,

अधरों पर मुस्कान खिला दें

हटें आवरण मिथ्या !

 

उसकी क्षमता है अपार फिर

क्यों संदेह जगाएं,

त्याग अहंता उन हाथों की

कठपुतली बन जाएँ !


सोमवार, मार्च 15

मानव में खुद छुपा चितेरा

मानव में खुद छुपा चितेरा 


महायज्ञ सृष्टि का अनोखा 

शुभ पंचतत्व आहुति देते,

इक-दूजे में हुए समाहित   

रूप अनेकों फिर धर लेते !


जल में पावक, वायु गगन में 

भू  में रहते सभी समाए, 

भव्य महान प्रपंच रचा है 

पंछी,पशु, प्राणी जनमाये !


मानव में खुद छुपा चितेरा 

जिसने रच डाला यह आलम, 

उसके द्वारा भी करवाता 

बड़े-बड़े अनगिन  आयोजन !


सिर पर छप्पर, अन्न क्षुधा हित 

शिक्षा और स्वास्थ्य के साधन,  

कोई भय से न कंपता हो 

हर कोई पाए अपनापन  !


तन-मन स्वस्थ बनें जन-जन के 

यही परम का इक सपना है  , 

है सामर्थ्यवान जो जग में 

औरों का दुख ही हरना  है !


निज की खातिर बहुत जी लिए 

अब औरों हित जीना सीखें, 

जगती के इस महा हवन में 

स्वयं पावन आहुति सौंपें !

 

शुक्रवार, अप्रैल 24

कृष्ण

कृष्ण 


कृष्ण कहते हैं 
जीवन एक यज्ञ है 
इसे युद्धक्षेत्र मत बनाओ 
किन्तु यदि कोई चारा न हो 
तो अपने-अपने गांडीव उठाओ !

कृष्ण की आँखों से जग को देखें 
तो कुरुक्षेत्र, यज्ञक्षेत्र ही नजर आता है 
यहां आहुति दे रहे हैं सभी 
अपने-अपने हिस्से की 
 अपने लिए नहीं हर 
युद्ध औरों के लिए लड़ा जाता है 

निज सुखों की आहुति देकर 
आज भी लड़ रहे हैं सैनिक 
कुछ सीमाओं पर कुछ अस्पतालों में 
सड़कों पर और मोहल्लों में 
जिन्हें रोक नहीं पाता
मृत्यु का भय 
कर्त्तव्य का पालन करते हुए यहाँ
हर रोज एक-एक कदम आगे बढा जाता है !