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सोमवार, जुलाई 18

जब याद कमल सर खिलता है

जब याद कमल सर खिलता है


तू हर उस पल में मिलता है 

जब याद कमल सर खिलता है, 

नहीं अतीत न भावी में ही 

दर्पण दर्शन का मिलता है !


मन जो नित भागा ही रहता 

कही हुई को फिर-फिर कहता, 

व्यर्थ कल्पना महल बनाए 

इस पल में ना कभी झाँकता !


जिसके पीछे ही अनंत इक 

अमन समंदर लहराता है, 

उस पल का उर बने आवरण 

जाने क्यों स्वयं को छल रहा !


मंगलवार, जून 16

अनगाया यदि रहा गीत

अनगाया यदि रहा गीत 


अनगाया यदि रहा गीत जो 
गाने आये थे हम भू पर, 
खिला नहीं यदि सरसिज उर में 
मिले नहीं उड़ने को दो पर !

मधुऋतु अगर न मन में उतरी 
फूटी नहीं हृदय की गागर, 
सूना रहा घाट उर सर का 
मन्दिर के द्वारे तक जाकर !

अंतर में यदि नहीं लालसा 
चाह नहीं यदि जगी मिलन की,
कैसे कारागार खुलेगा 
कैसे गूँजेंगे अनहद स्वर !