जब याद कमल सर खिलता है
तू हर उस पल में मिलता है
जब याद कमल सर खिलता है,
नहीं अतीत न भावी में ही
दर्पण दर्शन का मिलता है !
मन जो नित भागा ही रहता
कही हुई को फिर-फिर कहता,
व्यर्थ कल्पना महल बनाए
इस पल में ना कभी झाँकता !
जिसके पीछे ही अनंत इक
अमन समंदर लहराता है,
उस पल का उर बने आवरण
जाने क्यों स्वयं को छल रहा !
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