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बुधवार, जुलाई 12

स्पंदन

स्पंदन 


जो भी सृजित है 

गढ़ा गया है 

निरंतर गतिमान है 

सृजन के क्षण से 

तरंगित और कंपित है  

परमाणु में घूम रहे हैं 

सूक्ष्म इलेक्ट्रॉन 

अनवरत नाभि के चारों ओर 

जैसे घूमती है धरा 

अपनी सीमा में 

श्वास की धुन बज रही है रातदिन 

धारा मन की बहती जाती है 

नींद में भी 

किन्ह अनजान तटों को छू आती है 

समय का अश्व दौड़ा जा रहा है 

युग पर युग बीतते जाते हैं 

पर नहीं चूकती है ऊर्जा की यह 

अजस्र खान  

जो इस सारे आयोजन का

 आधार है 

इसीलिए तो मनुज को 

भगवान से प्यार है ! 


गुरुवार, मार्च 15

किसने खिलकर किये इशारे



किसने खिलकर किये इशारे


पी पी कह कर कौन पुकारे
किसे खोजते नयन तुम्हारे,
अंतर सरस तान बन गूँजा
किसने खिलकर किये इशारे !

हल्का-हल्का सा स्पंदन है
सूक्ष्म, गहन उर का कम्पन है,
जाने कौन उसे पढ़ लेता
चुप हो कहती जो धड़कन है !

मधुर रागिनी सा जो बिखरा
रस में पगा स्वाद मिश्री का,
तृप्त करे फिर तृषा जगाए
जादूगर वह कौन अनोखा !

एक तिलस्म राज इक गहरा
किसके चाहे खुलता जाता,
साया बनकर साथ सदा है
कौन प्रीत का गीत सुनाता !

सिहरन कब सम्बल बन जाती
भटकन कब मंजिल पर लाती,
कौन ख्वाब बन झलक दिखाता
किसकी चाह पूर्णता लाती !


रविवार, अगस्त 3

एक लहर शिव व सुंदर की


एक लहर शिव व सुंदर की


स्पृहा सदा सताती मन को
बढ़ जाता तब उर का स्पंदन,
सदानीरा सी मन की धारा
कभी न लेने देती रंजन !

संपोषिका प्रीत अंतर की
खो जाती हर पीड़ा जिसमें,
एक लहर शिव व सुंदर की
भर जाती थिरकन उर में !

मिटे स्पृहा प्रीत जगे जब
मुक्त खिलेगा अंतर उपवन,
सत्य साक्षी होगा जिस पल
सहज छंटेगा तिमिर का अंजन !