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शनिवार, अगस्त 9

भीतर एक नदी बहती है



भीतर एक नदी बहती है

भीतर एक नदी बहती है
लेकर कितने भेद हृदय में,
अंतर को सिंचित करती है !

उद्गम कहाँ ? कौन जानता
अंत भी अनदेखा ही रहता,
निर्मलता उर में भरती है !

तट पर कितने दुर्ग बनाये
युद्ध लड़े हारे जितवाए,
अनथक वह गतिमय रहती है !

सुर सरिता है यूँ भासता
देवलोक से आई भू पर,
मृत अतीत संग ले जाती है !

भावों की हाला भर उर में
मृदु मद्धिम गाती इक सुर में,
मंथर गति से इतराती है !



गुरुवार, सितंबर 20

शब्दों की सीमा बाहर है



शब्दों की सीमा बाहर है


शब्दों से ही परिचय मिलता
उसके पार न जाता कोई,
शब्दों की इक आड़ बना ली
कहाँ कभी मिल पाता कोई !

ऊपर ऊपर यूँ लगता है
शब्द हमें आपस में जोड़ें,
किन्तु कवच सा पहना इनको
बाहर ही बाहर रुख मोड़ें !

भीतर सभी अकेले जग में
खुद ही खुद से बातें करते,
एक दुर्ग शब्दों का गढ़ के
बैठ वहीं से घातें करते !

खुद से ही तो लड़ते रहते
खुद को ही तो घायल करते,
खुद को सम्बन्धों में पाके
खुद से ही तो दूर भागते !

हो निशब्द में जिस पल अंतर
एक ऊष्मा जग जाती है,
दूजे के भी पार हुई जो
उसकी खबर लिए आती है !

दिल से दिल की बात भी यहाँ
उसी मौन में घट जाती है,
शब्दों की सीमा बाहर है
भीतर पीड़ा छंट जाती है !

कोरे शब्दों से न होगा
मौन छुपा हो भीतर जिनमें,
वे ही वार करेंगे दिल पर
सन्नाटा उग आया जिनमें !