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मंगलवार, मई 19

अभी और यहाँ

अभी और यहाँ 


क्या तुम हो? 

हाँ, इससे कौन इंकार करेगा 

अपना होना तो सबने जाना है !


क्या तुम यहाँ हो ?

इसमें शक है 

तुम कहीं भी हो सकते हो 

चंद्रमा पर, समुद्र के किनारे, बाज़ार में या घर पर ! 


क्या तुम अभी हो ?

इसमें भी शक है 

तुम कल रात में अटके हो सकते हो 

या पिछले साल 

या दस साल पहले की 

किसी बात को याद करके 

आज भी रो सकते हो 

उतनी ही शिद्दत से !


यहाँ और अभी होने के लिए 

बस एक ही शर्त है

अपने केंद्र में रहना सीख लो 

तब कहीं और कभी भी रहो 

तुम सदा ही 

अभी और यहाँ हो !!

 

शुक्रवार, अप्रैल 18

केंद्र और परिधि

केंद्र और परिधि 


परिधि पर ही खड़ा हो कोई 

तो याद केंद्र की

भूले-भटके ही आती है 

मिल जाये जीवन का केंद्र 

तो परिधि फैलती चली जाती है !


परिधि से केंद्र पर जाना 

ऐसा ही है 

जैसे सतह से तल तक जाना 

सागर से कुछ मोती-माणिक 

 पा लेना 

टूटे शंख व सीपियाँ ही 

मिलती हैं सतह पर !


केंद्र पर पहुँचा हुआ 

लौट नहीं सकता 

उसी परिधि पर 

जहाँ से चला था 

वह अनंत हो जाती है 

भीतर-बाहर हर सीमा 

खो जाती है !


मंगलवार, फ़रवरी 18

चाह

चाह


स्वयं को केंद्र मानकर

दूसरे को चाहना 

पहली मंजिल है

जो हर कोई पा लेता है 

दूसरे को केंद्र मानकर

स्वयं को समर्पित कर देना 

दूसरी मंज़िल है 

जिसकी तलाश पूरी होने में

 समय लगता है 

न स्वयं, न दूसरे को 

अस्तित्त्व को केंद्र मान

मुक्त हो जाना है

अंतिम सोपान 

खुद से पार चला जाये जब कोई

तब सिद्ध होता है अभिप्राय

काश ! सबके जीवन में

जल्दी ही ऐसा दिन आए !



गुरुवार, मई 8

आना-जाना

 आना-जाना

न कोई किसी से दूर जाता है
न कोई किसी के पास आता है,
स्वयं से दूर और स्वयं के पास
हर मानव यहाँ आता-जाता है !

केंद्र से परिधि की यात्रा चलती है
दिन भर हलचल परिधि पर घटती है,  
निद्रा में केन्द्र पर विश्राम पाता है
थका हारा जब अपने घर जाता है !