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शुक्रवार, जनवरी 2

वह

पिछले वर्ष के अंतिम सप्ताह में मैं दिल्ली में भाई के घर में थी, उसी कड़ाके की सर्दी में यह यथार्थ कागज पर उतारा था.

वह  

बाहर है कोहरे की घनी चादर
ठंड के कारण शायद न आये वह
आज इतवार भी तो है !
भर जाती है भाभी के मन में आशंका
और जब नहीं आती वह दस बजे तक
मोबाइल फिर उठाया जाता है   
नहीं मिलता संतोषजनक कोई जवाब
जब-जब बजती है घंटी दरवाजे की
लगता है आ गयी है वही
पर पहले था सोसाइटी का चौकीदार
दूसरी बार निकला जमादार
तीसरी बार दूधवाला और
उम्मीदों पर पानी फेर देता है धोबी चौथी बार..  
फिर आधा घंटा किया बेसब्री से इंतजार
कुछ कहा-सुना फिर फोन पर
आयी है ‘वह’ तब जाकर
भाभी ने राहत की साँस ली है
‘उसने’ हाथ में जब झाड़ू थाम ली है...

शनिवार, नवंबर 1

ऋतू आयी मृदु भावों वाली


ऋतु आयी मृदु भावों वाली


धूप, हवा संग एक हो सकें
नदिया, पिकनिक, फूलों वाली
ऋतु आयी मृदु भावों वाली !

हल्की-हल्की ठंड रेशमी
नहीं ताप अब रवि बरसाता,
बादल लौट गये निज धाम
नीला चंदोवा हर्षाता !

धरा तृप्त है वारिद पीकर
कलियों, तितली, भंवरों वाली
ऋतु आयी मृदु भावों वाली !

 मदिर गंध ले बही समीरा
सुरभि बिखरने को है आतुर,
जीवन अपना राज खोलता
चले भूमि में सोने दादुर !

थिर गम्भीर हुई जलवायु
कण कण को हर्षाने वाली  
ऋतु आयी मृदु भावों वाली !




शुक्रवार, दिसंबर 13

पावनी प्रकृति

पावनी प्रकृति

ठंड एकाएक बढ़ गयी थी 
ढक लिया परिवेश को
 कुहरे की घनी चादर ने
वृक्ष के नीचे टपक रही बूँदे
भीगा था घास का हर तिनका
उसने अलाव में जलती लकड़ियों को
 थोड़ा आगे खिसका दिया
 लपेट लिया कम्बल को चारों ओर
मैला-कुचैला उसका कुत्ता भी
थोड़ा नजदीक सरक आया  
 और तभी हवा के तेज झोंके से
खुल गया उसकी झोंपड़ी का किवाड़  
हिमपात हो रहा था बाहर
श्वेत कतरे उतर रहे थे हौले हौले
धरा को संवारने आए हों जैसे
दरख्तों ने ओढ़ ली थी श्वेत चादर
रस्ते खो गये थे और एक सी लग रही थीं
 मकानों की छतें
भूल गया वह किवाड़ बंद करना
देखने लगा एकटक
प्रकृति के इस खेल को
इस मौसम की यह पहली बर्फ है
कितनी मोहक और पवित्र  
खड़े-खड़े हाथ जोड़ दिए उसने !

शनिवार, जनवरी 12

लौट लौट आते हैं मौसम


पौष का एक दिन

हुआ प्रातः, पर रात अड़ी है
जाने का यह नाम न लेती,
घना कोहरा, ढका गगन व
ठिठुरन तन को अकड़ा देती !

आज गगन का राजा भी तो
दुबका हुआ कहीं छुपा है,
बादल डाले डेरा नभ में
ठंड में दोहरा वार किया है !!

ऊपर से यह शीत लहर भी
जाने हवा कहाँ से आती,
निकट कहीं पर बर्फ गिरी है
उसके दे संदेशे जाती !

आग, धूप अब मित्र बनी हैं
गुड, रेवड़ियाँ बड़ी सोहतीं,
ठंडी शामें सिहरा जातीं
बस रजाई की बाट जोहतीं !

लिये कांगडी अगन तापते
कोई लाकड़ ढेर जलाते,
ढेरों कपड़े लादे तन पे
पूस की ठंड को दूर भगाते !

मंगलवार, फ़रवरी 7

आया वसंत झूम के


आया वसंत झूम के

धूप ने पिया जब फूलों का अर्क
भर गयी ऊर्जा उसके तन-बदन में....
कल तक नजर आती थी जो कृश और कुम्हलाई
आज कैसी खिल गयी है...
वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !

धरा ने ली अंगड़ाई
भर दिया वनस्पतियों में यौवन
सिकुड़ी, सूखी सी दिखती थी जो डाल
आज पल्लवों से मिल गयी है
वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !

पाले में ढके, कोहरे में कैद खेत
झूमने लगे पा परस
वासन्ती हवा का
चुप सी खड़ी थी जो सरसों की हर वह कली
आज फूल बन के घर से निकल गयी है
वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !

अंतर में हुलस उठी बालकों, बड़ों सबके
ठंड से जो थी बेहाल
घरों में बंद थी, हुल्लड मचाने
टोली उनकी फूलों के घर गयी है
वसंत के आने खबर उसको भी मिल गयी है !


सोमवार, दिसंबर 6

पौष का एक दिन

पौष का एक दिन

है प्रातः, पर रात अड़ी है
जाने का यह नाम न लेती,
घना कोहरा, ढका गगन यह 
ठिठुरन तन को अकड़ा देती !

आज गगन का राजा भी तो
दुबका बैठा कहीं छुपा है,
बादल डाले डेरा नभ में
ठंड में डबल वार किया है !!

ऊपर से यह शीत लहर भी
जाने हवा कहाँ से आती,
निकट कहीं पर बर्फ गिरी है
उसके दे संदेशे जाती !

आग, धूप अब मित्र बनी हैं
गुड, रेवड़ियाँ बड़ी सोहतीं,
ठंडी शामें सिहरा जातीं
बस लिहाफ की बाट जोहतीं !

लिये कांगडी अगन तापते
कोई लाकड़ ढेर जलाते,
ढेरों कपड़े लादे तन पे
पूस की ठंड दूर भगाते !

अनिता निहालानी
६ दिसंबर २०१०