पिछले वर्ष के
अंतिम सप्ताह में मैं दिल्ली में भाई के घर में थी, उसी कड़ाके की सर्दी में यह यथार्थ
कागज पर उतारा था.
वह
बाहर है कोहरे की घनी चादर
ठंड के कारण शायद न आये वह
आज इतवार भी तो है !
भर जाती है भाभी के मन में आशंका
और जब नहीं आती वह दस बजे तक
मोबाइल फिर उठाया जाता है
नहीं मिलता संतोषजनक कोई जवाब
जब-जब बजती है घंटी दरवाजे की
लगता है आ गयी है वही
पर पहले था सोसाइटी का चौकीदार
दूसरी बार निकला जमादार
तीसरी बार दूधवाला और
उम्मीदों पर पानी फेर देता है धोबी चौथी बार..
फिर आधा घंटा किया बेसब्री से इंतजार
कुछ कहा-सुना फिर फोन पर
आयी है ‘वह’ तब जाकर
भाभी ने राहत की साँस ली है
‘उसने’ हाथ में जब झाड़ू थाम ली है...

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