पलक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पलक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, जुलाई 7

उसने अपनी याद जरा सी

उसने अपनी याद जरा सी 


जब नयनों में नींद नहीं थी 

उसका ही तो ख़्वाब बसा था, 

सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से 

मन का आँगन पूर्ण भरा था !


अधरों पर मुस्कान सजीली 

ह्रदय की गहराई में तोष,

आश्वासन थपकी देता था 

लोरी गा रहा था संतोष !


फिर जाने कब निद्रा देवी 

पलकों पर आकर बैठी थी,   

उसने अपनी याद जरा सी 

शायद पीछे खिसका दी थी !


तन सोया ऊर्जा जगती थी 

कंपन सिहरन रह-रह होता, 

एक अखंड ज्योति जलती जब  

क्योंकर दर्श न उसका होता !


उसके पथ पर जो चलता है 

नित उपहार मिला करते हैं,

नींद, जागरण, स्वप्न सभी के 

जाकर पार मिला करते हैं !


मंगलवार, जनवरी 7

यह तो था अपना ही घर


यह तो था अपना ही घर

पलक बिछाए वह बैठा है
दोनों बाहें भी फैलाये,
एक कदम उस ओर बढ़ें तो  
बड़े वेग से वह भी आये !

प्रियतम का घर दूर नहीं था
राह भटक कर हमीं अभागे,
हाथ थाम कर लाया वह ही
जिस पल थे प्रमाद से जागे !

जाना पहचाना आलम था
यह तो था अपना ही घर,
धूल बहुत फांकी दुनिया की
कभी नजर न डाली भीतर !

एक उजाला मद्धिम मद्धिम
 राग मधुर कोई बजता था,
शांति अगर सी फ़ैल रही थी
प्रेम दीप बन के जलता था !

नहीं छलावा नहीं झूठ का
नहीं लोभ का नाम वहाँ था,
नहीं अभाव न मांग थी कोई
मस्ती का इक जाम वहाँ था ! 

सोमवार, मई 28

अब जो भी बाधा है पथ में


अब जो भी बाधा है पथ में

 
तुमको ही तुमसे मिलना है
खुला हुआ है मन उपवन,
जब जी चाहे चरण धरो तुम
सदा गूंजती है धुन अर्चन !

न अधैर्य से कँपतीं श्वासें
शुभ्र गगन से छाओ भीतर,
दिनकर की रश्मि बन छूओ
कुसुमों की या खुशबू बनकर !

कभी न तुमको बिसराया है
जगते-सोते याद तुम्हारी,
उठती-गिरती पलक में झलके
मेघों में ज्यों द्युति चमकारी !

जाने कब वह घड़ी मिलेगी
कब ढ़ुलकोगे अमृत घट से,
टूटेंगी कब सीमाएं सब
प्रकटोगे श्यामल झुरमुट से !

अब जो भी बाधा है पथ में
वह भी दूर तुम्हें करनी है
सौंप दिया जब शून्य, शून्य में
तुम्हें कालिमा भी हरनी है !