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सोमवार, अक्टूबर 11

भू से लेकर अंतरिक्ष तक


भू से लेकर अंतरिक्ष तक

कोई अपनों से भी अपना 
निशदिन रहता संग हमारे,
मन जिसको भुला-भुला देता 
जीवन की आपाधापी में !

कोमल परस, पुकार मधुर सी 
अंतर पर अधिकार जताता,
नजर फेर लें घिरे मोह में 
प्रीत सिंधु सनेह बरसाता !

साया बनकर साथ सदा है 
नेह सँदेसे भेजे प्रतिपल,
विरहन प्यास जगाये उर में 
बजती जैसे मधुरिम कलकल  ! 

अखिल विश्व का स्वामी खुद ही 
रुनझुन स्वर से प्रकट हो रहा,
भू से लेकर अंतरिक्ष तक
कैसा अद्भुत नाद गूँजता ! 

कान लगाओ, सुनो जागकर 
वसुधा में अंकुर गाते हैं,
सागर की उत्ताल तरंगे 
नदियों के भंवर भाते हैं !

जागें नैना मन भी जागे
चेतनता कण-कण से फूटे,
मेधा जागे, स्वर प्रज्ञा के 
हर प्रमाद अंतर से हर ले ! 

मंगलवार, मई 11

शिक्षा को मूल्यों से भर लें

शिक्षा को मूल्यों से भर लें


अंतरिक्ष तक जा पहुँचा है 

अनगिन तारा मण्डल खोजे, 

सागर की गहराई नापी 

किन्तु हुआ बेबस नर सोचे !


भेद दिया परमाणु मनुज ने 

विनाशकारी बम बरसाया, 

लाखों लोगों को इक पल में 

मृत्यु के आँचल में सुलाया !


सूक्ष्म की ताकत अपरिमित है 

मानव से बढ़ कौन जानता, 

सूक्ष्म तरंगों के बल पर ही 

वर्ल्ड वाइड वेब  रच डाला !


किन्तु सूक्ष्म से लड़ना होगा 

इसकी शायद खबर नहीं थी, 

चिकित्सा पद्धति की सीमा है 

इस तत्व पर नजर नहीं थी !


अभी नहीं था अवगत इससे 

सूक्ष्म जगत भी एक यहां है, 

जीवाणु, विषाणु भी अनेकों 

जिनका बहुत प्रकोप सहा है !


अब भी जाग सकें तो जागें 

जीवन में परिवर्तन कर लें, 

झुकें परम शक्ति के सम्मुख 

शिक्षा को मूल्यों से भर लें !

 

मंगलवार, अक्टूबर 27

हम और अस्तित्व

हम और अस्तित्व

 

हम वह वृक्ष बन सकें

जो हजारों का भला करता है

छाँव देता और उनकी क्षुधा हरता है

या बनें बाँसुरी जो खाली है भीतर से

पर अस्तित्व के अधरों से लगकर

मधुर संगीत जिससे उपजता है

हमारे भीतर से हम जब लुप्त हो जाते हैं

सारा संसार समा  जाता है

हवाएं बहने लगती हैं

शक्ति का प्रवाह ऊपर से गिरता है

जैसे शंकर की जटाओं में सिमट जाती है गंगा

बहती है वह जग की तृषा हरने

गौरी धरती है भीषण काली का रूप

सहना होगा जिसे असुरों का आक्रमण

हजार विरोध भी, पर वहाँ कोई नहीं होगा

जो अपमानित हो सके तिल भर

हमें भी बनना होगा मसीहा

छोटा या बड़ा  

क्योंकि अंतरिक्ष समेटे है हर कोई अपने भीतर !

  

मंगलवार, दिसंबर 13

राग प्रीत का जो साधा था

राग प्रीत का जो साधा था  

है विशाल, अनन्त, अनूठा 
कैसे लघु मन उसको जाने 
शिखर चाहता भय खाई से 
सीमा स्वयं की, यह न माने !

खुल जायेगा हर वह बंधन 
सुख की आस में जो बाँधा  था,
छलक-छलक वह बह जाएगा 
राग प्रीत का जो साधा था !

युगों-युगों से गूँज रहा स्वर 
अंतरिक्ष न बाँच  सका  है,
गा - गा कर खग वृन्द थके न 
क्यों उर में संदेह  जगा है !

अश्रु बने हैं पाती जिसके 
कतरा- कतरा बहे सभी दुःख,
एक अलस मद मस्त खुमारी 
बून्द-बून्द कर रिसता है सुख !

सदा निहारे नयन मौन हो 
श्वासों में गंध बन बसता,
साया कोई संग चल रहा 
 परस पवन का  दे-दे  हँसता !






सोमवार, सितंबर 27

मैं कौन हूँ

मैं कौन हूँ

एक चेतना ! चिंगारी हूँ
एक ऊर्जा सदा बहे जो,
सत्य एक धर रूप हजारों
परम सत्य के संग रहे जो !

अविरत गतिमय ज्योतिपुंज हूँ
निर्बाधित संगीत अनोखा,
सहज प्रेम की निर्मल धारा
पावनी शांति पुहुप सरीखा !

चट्टानों सा अडिग धैर्य हूँ
कल-कल मर्मर ध्वनि अति कोमल,
मुक्त हास्य नव शिशु अधरों का
श्रद्धा परम अटूट निराली !

अन्तरिक्ष भी शरमा जाये
ऐसी ऊँची इक उड़ान हूँ,
पल में नापे ब्रह्मांडों को
त्वरा युक्त इक महायान हूँ !

एक शाश्वत सतत् प्रवाह जो 
शिखरों चढ़ा घाटियों उतरा,
पाया है समतल जिसने अब
सहज रूप है जिसका बिखरा !

अनिता निहालानी
२७ सितम्बर २०१०