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रविवार, फ़रवरी 2

सुख की फसल भीतर खिले

उन सभी बच्चों के नाम जिनका आज जन्मदिन है और जो घर से दूर हैं

सुख की फसल भीतर खिले


 है गगन सीमा तुम्हारी उसके पहले मत थमो, बिखरी हुईं मन रश्मियां इक पुंज अग्नि का बनो ! जब नयन खोले थे यहाँ अज्ञात थी सारी व्यथा, कुछ खा लिया फिर सो गए इतनी ही थी जीवन कथा ! फिर भेद मेधा के खुले सारा जगत पढ़ने को था, थी हर कदम पर सीख कुछ हर दिवस बढ़ने को था ! अनन्त है सभी कुछ यहाँ अभाव केवल भ्रम ही है, सीमित इसे हमने किया मंजिल कदम-कदम ही है! खुद का भरोसा नित करो मन में न भय कोई पले, है स्वप्न में जन्नत अगर सुख की फसल भीतर खिले ! दूर घर से देश से भी जन्मदिन पर लो दुआएं, नव वर्ष बीते सुख भरा मिल सभी यह गीत गाएं !


शुक्रवार, जनवरी 17

प्रेम


प्रेम 


एक-दूजे को समझते हुए 
एक दूजे को ऊपर उठाते हुए 
साथ-साथ जीने का नाम ही प्रेम है 
अहंकार तज कर हँसते-हँसते हर मान-अपमान को 
सहने का नाम ही प्रेम है 
दूसरे को प्रीतिकर हों ऐसे वचन ही मुख से निकलें 
इस सजगता का नाम ही प्रेम है 
सब कुछ साझा है इस जहाँ में 
हर कोई जुड़ा है अनजान धागों से,
धरा, गगन, पवन, अनल और सलिल के साथ 
जुड़ाव महसूस करने का नाम ही प्रेम है 
मैत्री और साहचर्य का आनन्द लेने और बाँटने का नाम ही प्रेम है 
मुक्त है यह प्रेम एकाधिकार से, दुःख और घृणा से 
जो बाँधता नहीं मुक्त करता है 
अनंत से मिलाने का दम रखता है 
अंतर में शांति और आनंद भरता है 
एक समन्वय, सामंजस्य और बोध का नाम ही प्रेम है !  

मंगलवार, अक्टूबर 29

वर्तमान का यह पल

वर्तमान का यह पल 

घट रहा है जीवन अनंत-अनंत रूपों में 
 वर्तमान के इस छोटे से पल में 
सूरज चमक रहा है इस क्षण भी 
अपने पूरे वैभव के साथ आकाश में 
गा रहे हैं पंछी.. जन्म ले रहा है कहीं, कोई नया शिशु 
फूट रहे हैं अंकुर हजार बीजों में 
गुजर रही है कोई रेलगाड़ी किसी सुदूर गांव से 
निहार रही हैं आँखें क्षितिज को किसी किशोरी की जिसकी खिड़की से 
वर्तमान का यह पल नए तारों के सृजन का साक्षी है 
पृथ्वी घूम रही है तीव्र गति से सूर्य की परिक्रमा करती हुई 
यह नन्हा क्षण समेटे है वह सब कुछ 
जो घट सकता है कहीं भी, किसी भी काल खंड में 
सताया  जा रहा है कोई बच्चा 
और  दुलराया भी जा रहा हो
कोई वृक्ष उठाकर कन्धों पर ले जा रहे होंगे कुछ लोग 
कहीं तोड़ रहे होंगे फल कुछ शरारती बच्चे 
इसी क्षण में रात भी है गहरी नींद भी 
स्वप्न भी, सुबह भी है भोर भी 
जो जीना चाहे जीवन को उसकी गहराई में 
जग जाए वह वर्तमान के इस पल में 
जिसमें सेंध लगा लेता है अतीत का पछतावा 
भविष्य की आकांक्षा, कोई स्वप्न या कोई चाह उर की 
हर बार चूक जाता है जीवन जिए जाने से 
हर दर्द जगाने आता है 
कि टूट जाये नींद और जागे मन वर्तमान के इस क्षण में...

शनिवार, फ़रवरी 16

ऐसा है वह अनंत


ऐसा है वह अनंत

चादर की तरह लपेट लिया है काँधे पर
उसने नीले आकाश को
मस्तक पर चाँद की बिंदी लगाये
धार लिया है सूरज वक्षस्थल पर गलहार में
आकाश गंगाएं उसकी क्रीडा स्थली हैं
सितारों को पहन लिया है कानों में
बादलों में छिपी बूँदें
बन गयी हैं पाजेब पैरों की
दिशाओं को भर लिया है हाथों में
ऐसा है वह अनंत
उसे कोई भी नाम दो
हर रोज उतरता है धरा पर
साथ जागरण के
हर रात झांकता है नींद में !