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शुक्रवार, अगस्त 18

वर्तमान भविष्य के हाथों में

वर्तमान भविष्य के हाथों में

नवजात शिशु की पकड़ भी 

कितनी मज़बूत है 

मुट्ठी में अंगुली थमाकर देखती है माँ   

 जकड़ लेता है 

दृढ़ता से

मुस्कान थिर है 

नींद में भी उसकी

माँ को लगता है 

जैसे वर्तमान ने 

भविष्य के हाथों में 

स्वयं को सौंप दिया हो ! 


शुक्रवार, दिसंबर 18

बीज एक यात्रा

बीज एक यात्रा 
सुबह बीज है
जिस पर दिन का फल लगता है
ऐसे ही जैसे शैशव बीज से
जीवन लता फैलती है
वर्तमान है वह बीज
जिसमें भावी विशाल वटवृक्ष छिपा है
सुबह यदि खो गयी
तंद्रा-अलस में डूबी
तो दिन उखड़ा-उखड़ा सा रहेगा
अधूरापन सताएगा
शैशव को नहीं  संभाला गया
कोमल किन्तु सुदृढ़ हाथों से
न हुआ संस्कारित तो जीवन दिशाहीन हो
इसमें अचरज  ही कैसा  ?
बच्चे जो पलते हैं सड़कों पर
कठोर होता है बचपन जिनका
क्या बदल नहीं जाएंगे उद्दंड युवा और उदास वयस्कों में
वर्तमान के बीज से ही भावी पनपता है
यदि आज हो रहा है तृप्ति का अहसास सार्थक कृत्यों द्वारा
तभी कल बाहें फैलाए मिलेगा
कर्मशील है अब तो कल भी हाथ काम करते-करते ही विदा लेंगे
वर्तमान मनु है तो भविष्य देव
आज पुरुषार्थ है तो भावी प्रारब्ध
जैसा दिन होगा रात होगी वैसी
ऊर्जा से भरा दिवस ही विश्राम से भरी रात्रि का जनक है !

सोमवार, दिसंबर 2

मन से अमन तक

मन से अमन तक 



हर श्वास वर्तमान में घटती है 
हर वचन वर्तमान में बोला जाता है 
हर भाव वर्तमान में जगता है 
हर फूल वर्तमान में खिलता है 
हर भूख वर्तमान में लगती है 
हर गलती वर्तमान में ही हो रही होती है 
सब कुछ घटा है और घट रहा है वर्तमान में 
तो मन क्यों नहीं रहता वर्तमान में 
कभी बीते हुए कल को ले आता है 
कभी भविष्य को लेकर डरता है 
यूँही तिल का ताड़ बनाकर 
कल्पनाओं में घरौंदे बनाता-बिगाड़ता है 
मन जिसे कहते हैं 
वह भूत और भावी की परछाई है 
भूत जो कभी वर्तमान था 
भावी जो कभी वर्तमान बनेगा 
मन एक प्रतिबिम्ब है 
छाया मात्र.. 
और उसी से चलता है जीवन 
ऐसा जीवन भी एक भ्रम के अतिरिक्त भला क्या होगा 
मन सदा पुराने को ढोता है 
भविष्य को भी अतीत के चश्मे से देखता है 
वास्तविक जीवन इसी क्षण में है 
जब अस्तित्व मौजूद है पूर्ण रूप से 
जिसे ढाल सकते हैं नए-नए रूपों में 
वर्तमान सदा नया है 
हर पल अछूता, प्रेम पूर्ण  
हर पल असीम और अनंत !

शनिवार, नवंबर 9

पिता

पिता 

पिता के लिए दुनिया एक अजूबा बन गयी है 
जैसे कोई छोटा बच्चा देखता है हर शै को अचरज से 
उनकी आँखें विस्मय से भर जाती हैं 
झुर्रियों से अंदर छुप गयीं सी उनकी मिचमिचाती आँखों में 
जब तब ख़ुशी का कमल खिल उठता है 
जिसे देखकर संतानों का मन भी आश्वस्त हो जाता है 
ठीक उसी तरह जैसे पिता बचपन में तृप्त होते थे 
देख-देख उनके चेहरे की मुस्कान 
वे उन्हें फेसबुक, गूगल, व्हाट्सएप से परिचित कराते हैं 
नतिनी-पोते उन्हें मोबाइल के राज बताते हैं 
कुछ देर नानुकर वह तत्पर हो जाते हैं 
सीखने आधुनिक युग की भाषा 
बटन दबाते पूरी होती कैसे  हरेक की आशा 

उनके अपने बचपन में धूल भरी गलियों में दौड़ते हुए मवेशी हैं 
किसान हैं, बंटवारे की कटु स्मृतियाँ हैं 
पर रहना सीख लिया है उन्होंने निपट वर्तमान में 
माँ भी रह गयी हैं पीछे 
शायद देखा हो कभी स्वप्नों में 
जो कभी रही थीं साथ हर सुख-दुःख में 
वे जी रहे हैं आज के हर पल के साथ कदम मिलाते
उनकी आवाज में अब भी वही रुआब है 
जिसे सुनने के लिए उत्सुक है संतान
देखना चाहती है पिता के भीतर ऊर्जा का प्रवाह 
जैसे कोई बच्चा बड़ों को धमकाए अपनी नादाँ प्यारी हरकतों से 
तो वारी जाते हैं माँ-बाप 
बच्चा आदमी का पिता होता है कवि ने सही कहा है 
चक्र घूम रहा है कब बालक बन जाता है वृद्ध 
कोई नहीं जानता

निमन्त्रण देते हैं सभी उन्हें अपने-अपने घर आने के लिए 
नए-नए आविष्कार, नए स्थान दिखाने 
सभी देखना चाहते हैं उनके चेहरे पर हँसी और मुस्कान 
दिखाना, आधुनिक सुख-सुविधाओं से भरे मकान 
पिता सन्तुष्ट हैं जैसे मिला हो कोई समाधान
ज्यादातर समय रहते हैं स्वयं में ही व्यस्त 
किताबों और संगीत की दुनिया में मस्त 
कभी अख़बार के पन्ने पलटते अधलेटे से 
लग जाती है आँख भरी दोपहरी में 
तो कभी जग जाते हैं आधी रात को ही 
अल सुबह चिड़ियों के जगने से पूर्व ही छोड़ देते हैं  बिस्तर 
अपने हाथों से चाय बनाकर पी लेते 
ताकत महसूस करते हैं वृद्ध तन में 
फोन पर जब संतानें पूछती हैं हाल तबियत का 
तो नहीं करते शिकायत पैरों में बढ़ती सूजन की 
या मन में उठती अनाम आशंका की 
दर्शन की किताबों में मिला जाता हैं उन्हें हर सवाल का जवाब 
मुतमईन हैं खुद से और सारी कायनात से 
कर लिया है एक एग्रीमेंट जैसे हर हालात से !

कार्तिक पूर्णिमा के दिन पिताजी का नवासीवां जन्मदिन है.

मंगलवार, अक्टूबर 29

वर्तमान का यह पल

वर्तमान का यह पल 

घट रहा है जीवन अनंत-अनंत रूपों में 
 वर्तमान के इस छोटे से पल में 
सूरज चमक रहा है इस क्षण भी 
अपने पूरे वैभव के साथ आकाश में 
गा रहे हैं पंछी.. जन्म ले रहा है कहीं, कोई नया शिशु 
फूट रहे हैं अंकुर हजार बीजों में 
गुजर रही है कोई रेलगाड़ी किसी सुदूर गांव से 
निहार रही हैं आँखें क्षितिज को किसी किशोरी की जिसकी खिड़की से 
वर्तमान का यह पल नए तारों के सृजन का साक्षी है 
पृथ्वी घूम रही है तीव्र गति से सूर्य की परिक्रमा करती हुई 
यह नन्हा क्षण समेटे है वह सब कुछ 
जो घट सकता है कहीं भी, किसी भी काल खंड में 
सताया  जा रहा है कोई बच्चा 
और  दुलराया भी जा रहा हो
कोई वृक्ष उठाकर कन्धों पर ले जा रहे होंगे कुछ लोग 
कहीं तोड़ रहे होंगे फल कुछ शरारती बच्चे 
इसी क्षण में रात भी है गहरी नींद भी 
स्वप्न भी, सुबह भी है भोर भी 
जो जीना चाहे जीवन को उसकी गहराई में 
जग जाए वह वर्तमान के इस पल में 
जिसमें सेंध लगा लेता है अतीत का पछतावा 
भविष्य की आकांक्षा, कोई स्वप्न या कोई चाह उर की 
हर बार चूक जाता है जीवन जिए जाने से 
हर दर्द जगाने आता है 
कि टूट जाये नींद और जागे मन वर्तमान के इस क्षण में...

शुक्रवार, जुलाई 15

यह पल

यह पल 

अतीत के अनन्त युग सिमट  आते हैं 
वर्तमान के एक नन्हे से क्षण में 
भविष्य की अनंत धारा भी 
छोटा सा यह पल कितना गहरा है 
साक्षी है जो बीते  बरसों का 
और छिपा है जिसमें भावी का हर स्वप्न 
हर क्षण अतीत की कोख से जन्मा  है और 
निज गर्भ में समेटे है  कल 
नहीं टूटती है यह श्रृंखला 
नहीं टूटी है आजतक !
इस पल में ठहरना ही ध्यान है 
इस पल में रुकना ही तोड़ देता है हर सीमा 
जो घेर लेती है आत्मा को 
करने कैद उसकी ही मान्यताओं के घेरे में !


शनिवार, सितंबर 14

लड़कियाँ

लड़कियाँ



बड़ी समझदार, थोड़ी नादान
खुद से अनजान, करतीं पहचान
वर्तमान और भविष्य की
कड़ी लड़कियाँ !

हवा सी तेज, पानी सा बहाव
 हिरनी सी चाल, डाली सा झुकाव
चुनौती दें आँखों से हर  
घड़ी लड़कियाँ !

चेहरों पे ओज, कांधे पे बोझ
ऊँची चढाइयाँ तय करें रोज
हंसती खिलखिलाती सी
 लड़ी लड़कियाँ !

अंतर में प्यार, हिम्मत अपार
 बिखरे जहाँ को, दे पल में संवार
 धरती की अंगूठी में
 जड़ी लड़कियाँ !