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बुधवार, दिसंबर 6

क्यों दिल की साँकल उढ़का ली


क्यों दिल की साँकल उढ़का ली


भरें न कल्पना की उड़ानें 

कैसे नये क्षितिज पायेंगे ? 

नियत सोच में सिमटे रहकर 

बस पुरातन दोहरायेंगे !


जहाँ अनंत कपाट खुले हों 

कैसे कोई घर में बैठे, 

महासमंदर ठाँठे मारे 

क्यों न मुसाफ़िर गहरे पैठे !


पलकों में सपने तिरतें हों 

अंतर भरे उमंग उल्लास, 

अधरों पर हों गीत मिलन के 

जागा रहे पल-पल विश्वास !


दूरी नहीं जरा भी उससे 

जिसका पथ ये कदम ढूँढते, 

अहर्निशम् दीपक जलता है 

नयन मुँदे हों या हों जगते !


कोकिल और पपीहा प्यासे 

अब भी लगन जगे अंतर में, 

चातक तकता नील गगन को 

अब भी मोर नाचते वन में !


जीवन दे उपहार अनोखे 

अपनी ही झोली क्यों ख़ाली, 

सब दे कर भी कभी न चुकता

क्यों दिल की साँकल उढ़का ली ! 


रविवार, नवंबर 8

झलक उसकी बरस जाती


झलक उसकी बरस जाती


कल्पना के पंख ओढ़े

उर गगन में उड़  रहा है,

कभी शीतल चंद्रमा,घन

ताप से भी जुड़ रहा है !

 

जाग कर देखे घड़ी भर

रात-दिन यूं घट रहे हैं,

जो कभी उगता न डूबा 

पूर्व-पश्चिम छल रहा है !

 

सत नहीं जो मान उसको

व्यर्थ ही मन बोझ ढोता,

जो कभी आए नहीं भय 

उन दुखों का खोज लेता !

 

स्वयं मंजिल दूर रखकर

दौड़ उसकी फिर लगाता,

पूर्ण होकर "भरूँ  कैसे ?"

मंत्र का फिर जाप करता !

 

इक खलिश की आंच दिल में 

सुगबुगा धूआँ उठाती,

प्रखर ज्वाला बन जले यदि

झलक उसकी बरस जाती !


शुक्रवार, अगस्त 28

मन नदिया बन प्यास बुझाता

 मन नदिया बन प्यास बुझाता 

सुख-दुःख रूपी तटों के मध्य 

मन की धारा बहती रहती, 

अभी कल्पना की तरंग है 

फिर स्मृति की लहरें उठतीं !

 

जुड़ी रहे यदि नदी स्रोत से 

निर्मल अविरल गतिमय रहती, 

दर्पण सी उसकी काया में 

छवि जग की प्रतिबिम्बित होती !

 

बिछड़ गयी जो अपने घर से 

मरुथल में जाकर खो  जाती, 

या फिर कोई सरवर, पोखर 

बनकर सीमित, दूषित होती !

 

किन्तु कहीं भी कैसा भी हो 

जल तो जल है पथ पायेगा,

तप कर कोई बादल बनकर 

बरस शिलाओं पर जायेगा !

 

मन नदिया बन प्यास बुझाता 

सुख की सुंदर फसल उगाता,

वही हुआ दूषित माया से 

जंगल दुःख के भी पनपाता !

 

चंचल मीन भावनाओं की 

क्रोध, बैर के ग्राह तैरते, 

मन तो मन है पल-पल बदले 

लोभ, मान के भँवरे पड़ते !

 

मन ही राम कृष्ण को चाहे 

मन ही बन मन्थरा सिखाये, 

जग को बैरी कभी मानता

गीत कभी उसके ही गाये !


बुधवार, अप्रैल 8

सत्य होती कल्पना भी

सत्य होती कल्पना भी

स्वप्न में हम सृष्टि रचते निज भयों को रूप देते, खुद सिहरते, व्यर्थ डरते जागकर फिर खूब हँसते ! मनोमयी, भावनामयी जाग कर भी सृष्टि रचते, निज सुखों को पोषते या दुःखों की गाथा बनाते ! शब्द साझे हैं सभी के उन्हीं से हम मित्र बनते, चुन नुकीले शब्द सायक शत्रुता अथवा रचाते ! कल्पना थी जो मनों की आज उसने रूप धारा, डोलते मन व्यर्थ खुद को डाल देते अतल कारा ! हैं कहीं हथियार जैविक आदमी ने ही बनाये, सत्य होती कल्पना भी वक्त यह सबको सिखाये !

गुरुवार, अक्टूबर 4

खुद न जाने जागता मन


खुद न जाने जागता मन


स्वप्न रातों को बुने मन
नींद में कलियाँ चुने मन,
क्या छिपाए गर्भ में निज
खुद न जाने जागता मन !

कौन सा वह लोक जिसमें
कल्पना के नगर रचता,
कभी गहरी सी गुहा में
एक समाधि में ठहरता !

छोड़ देता जब सुलगना
इस-उसकी श्लाघा लेना,
खोल कर खिड़की के पाट
आसमा को लख बिलखना !

 एक अनगढ़ गीत भीतर
सुगबुगाता सा पनपता,
एक न जाना सा रस्ता
सदा कदमों को बुलाता !

राज कोई खुल न पाया
खोलने की फिकर छोड़ी,
कौन गाये नीलवन में ?
सुनो ! सरगम, तान, तोड़ी !


मंगलवार, जनवरी 21

नींद में ही सही...

नींद में ही सही...


कुछ स्मृतियाँ कुछ कल्पनाएँ
बुनता रहता है मन हर पल
चूक जाता है इस उलझन में
आत्मा का निर्मल स्पर्श....
 यूँ तो चहूँ ओर ही है उसका साम्राज्य
 घनीभूत अडोल वह है सहज ही ज्ञातव्य
 पर डोलता रहता है पर्दे पर खेल
मन का अनवरत
तो छिप जाती है आत्मा
असम्भव है जिसके बिना मन का होना
उसके ही अस्तित्त्व से बेखबर है यह छौना
नींद में जब सो जाता है मन कुछ पल को
आत्मा ही होती है भीतर
तभी नींद सबको इतनी प्यारी है
नींद में ही हो जाती है खुद से मुलाकात
 पर अफ़सोस ! नहीं हो पाती तब भी उससे बात
जागरण में तो दूर हैं ही उससे
शयन में भी हो जाते हैं दूर उससे
कब होगा वह ‘जागरण’
जब जगते हुए भी प्रकटेगी वह और नींद में भी....