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गुरुवार, मार्च 9

सच है न !

सच है न ! 

सच को झुठलाते हैं हम 

लाख छुपाते भी हैं 

भूल जाना चाहते हैं उसे 

सच से मूँद लेते हैं आँखें 

डरते भी हैं

दरकिनार कर उसे 

झूठ का एक ताजमहल खड़ा कर लेते हैं 

पर वह टिकता नहीं 

टिक सकता नहीं 

सच अनावृत होता है 

और सब बिखर जाता है 

अदेखा कर के भी कोई 

सच से बच नहीं सकता 

भीतर-भीतर कुरेदता रहता है 

सच कितना भी कड़वा हो 

उसे घूँट-घूँट पीना ही  होता है  

उसकी नींव पर खड़ी होती है 

प्रेम की इमारत 

सच की स्याही से लिखी जाती है 

कभी न मिटने वाली इबारत ! 



बुधवार, अप्रैल 27

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का



फ़लसफ़ा ज़िंदगी का


कभी सुकून कभी बेताबी बन कर छा गया 

वह क्या था जो अक्सर इस दिल को भरमा गया 


पहरों बैठ कर सुलझाये थे सवाल जिसके 

वह दिलेफूल तो इक पल में ही मुरझा गया 


सही था ग़लत मान बैठे थे जिसको कब से 

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का इक बच्चा समझा गया 


कभी तन्हा तो कभी सजी महफ़िलें संग-संग 

इस उड़नखटोले पर भला कौन बैठा गया 


अंधेरे बढ़ गए दुनिया में यकीं जब हुआ 

कौन चुपचाप आके दिल को फिर सहला गया 


हारा सच जीत झूठ की हुई होगी जग में 

सच का बिरवा ख़ुदा फिर से मन में लगा गया 


गुरुवार, जुलाई 22

एक चिंगारी असल की

एक चिंगारी असल की 

दर्द भीतर सालता जो 

प्रेम बनकर वह बहेगा,  

भूल चुभती शूल बनकर 

पंक से सरसिज खिलेगा !


खोल दो हृदय को अपने 

जब साथ है रहबर खड़ा, 

लक्ष्य अपना एक हो तो 

विष  यहाँ अमीय बनेगा !


परख लो हर बात अपनी 

बनी हो चाहे बिगड़ती,  

सत्य का दामन न छोड़ा 

झूठ फिर कब तक टिकेगा !


सौ भ्रमों से ढका हो मन 

ज़िंदगी आसान लगती, 

एक चिंगारी असल की 

खेल फिर कब तक टिकेगा !


हुआ सच से सामना जब 

नहीं कोई ठौर मिलता, 

नींद स्वप्नों से भरी हो 

जागना इक दिन पड़ेगा !




बुधवार, जनवरी 22

समाधि का फूल

समाधि का फूल

“जब गिर जाएगी झूठ की आखिरी दीवार भी भीतर 
सुडौल हो जायेगा भावनाओं का नुकीला पत्थर घिसते-घिसते 
जो चुभ जाता था खुद को और चुभाया जाता था दूसरों को 
जब तृप्त हो जाएगी मन की आखिरी वासना भी 
जीने की, यश और साहचर्य की 
“जब गिर जाएगी झूठ की आखिरी दीवार भी भीतर सुडौल हो जायेगा भावनाओं का नुकीला पत्थर घिसते-घिसते जो चुभ जाता था खुद को और चुभाया जाता था दूसरों को जब तृप्त हो जाएगी मन की आखिरी वासना भी जीने की, यश और साहचर्य की जब उत्तेजना के साधन नहीं जुटाने होंगे मन के शावक को तृप्त होगा वह उस कोमल शिशु की भांति जो जल की अनंत राशि पर लेटा तिरता है जब ऐसा होगा तो समाधि का फूल खिलेगा” कहा गुरू ने पूछा शिष्य ने, “जब तक खिले न समाधि का फूल, कोई ऐसा कैसे हो सकता है ? देख पायेगा वही भीतर असत्य का धुआं जो जाग गया है आत्मकामी होना बिना असीम सुख को पाए सम्भव ही नहीं “ गुरू ने एक फूल दिया शिष्य को और पूछा, “यह पहले खिला या सहे इसने बीज से फूल होने की यात्रा के दंश मिटाया अपने अस्तित्व को सही धूप और बारिश की मार वह बीज तुम हो ! समाधि का फूल जो खिलेगा एक दिन उसकी संभावना भीतर लिए हो !”

मंगलवार, मार्च 28

मिट जाने को जो तत्पर है


मिट जाने को जो तत्पर है

मरना जिसने सीख लिया है
उसको ही है हक जीने का,
साँझ ढले जो मुरझाये, दे
प्रातः उसे अवसर खिलने का !

मिट जाने को जो तत्पर है
वही बना रहता इस जग में,
ठोकर से जो न घबराए
बना रहेगा जीवन मग में !

सच की पूजा करने वाले
नहीं झूठ से बच सकते हैं,
जो सुन्दरता को ही चाहें
वही कुरूपता लख सकते हैं !

बोल-अबोल, मित्र-शत्रु भी
है पहलू इक ही सिक्के का,
सदा डोलता रहता मानव
 बना हुआ एक दोलक सा !




मंगलवार, अगस्त 18

दिया जो पहले मिला वही

दिया जो पहले मिला वही


जो खाली है वही भरा है
सच ही सच ! न झूठ जरा है,
जो दिखता है.. वही नहीं है
नजर न आता वही वही है !

धरा दौड़ती.. थामे सबको
थिर दिनकर यात्री बनता,
दिया जो पहले मिला वही
मिटा यहाँ जो.. बचा वही !

शब्दों से प्यास नहीं बुझती,
नदिया पर जाना होता है,
पिंजरे से गगन नहीं मिलता
नभ में ही गाना होता है !   

रविवार, अगस्त 24

सत्य से पहचान

सत्य से पहचान 



झूठ से ही परिभाषित करते हैं  
‘स्वयं’ को जब हम
तब छले जाते हैं बार-बार
“जो है” जब उस पर नजर नहीं जाती
‘जो होना चाहते हैं’ की चाह में जले जाते हैं
“जो है” शुभ है, सुंदर है, सत्य है
इसे भुलाकर
घेर लेते हैं अपने चारों पर एक असत्य
व्यर्थ ही कैद होते हैं पिंजरों में
और झूठी आशा में जिए जाते हैं  
 ‘स्वयं’ को करते सीमाओं में कैद
 मन, कभी अहंकार के हाथों
अपने ही मूल को डसते हैं
जाने कैसा रोग लगा है
‘जो है’ स्वीकार करना नहीं सीखा
सच के आईने में स्वयं को अभी नहीं देखा
मृण्मय है जो माया
उसको तो हमने बहुत सजाया
सम्मान के लोभ में  
खुद को कहीं पीछे छोड़ आये
एक बेहोशी के आलम में
स्वप्नों की दुनिया बसाना चाहते हम
सत्य से हर बार बच कर निकल आये 
समिधा बनेगा अंतर का हर भाव 
यहाँ तक कि हर दुराव व छिपाव 
स्वयं की अग्नि तभी होगी दीप्त 
छा जायेंगे मेघ चिदाकाश में 
सत्य बरसेगा !
अतीत, वर्तमान, व भविष्य 
गायेंगे जब समवेत स्वरों में 
जीवन की ऋचाएं 
मन वर्तिका जलेगी ज्ञानाग्नि में 
यज्ञ पुरुष सत्य बन प्रकटेगा !