नये वर्ष में
यूँ तो हर घड़ी नयी है
हर पल घटता है पहली बार
हर क्षण जन्मता है समय की
अनंत कोख में
प्रथम और अंतिम बार एक साथ
दोहराया नहीं जाता सृष्टि
में कुछ भी
क्योंकि अनंत है सामर्थ्य
इसका
नहीं आएगा बीता वर्ष दोबारा
इस महायज्ञ में होने शामिल
फिर भी हर आगत को नूतन गढ़ना
है
यदि विकास के सोपान पर चढ़ना
है
और अंतर में गहरे बढ़ना है
नया अंदाज हो बात को कहने
का
सीखें गुर दरिया सा सदा
बहने का !





