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मंगलवार, जनवरी 8

नये वर्ष में




नये वर्ष में

यूँ तो हर घड़ी नयी है
हर पल घटता है पहली बार
हर क्षण जन्मता है समय की अनंत कोख में
प्रथम और अंतिम बार एक साथ
दोहराया नहीं जाता सृष्टि में कुछ भी
क्योंकि अनंत है सामर्थ्य इसका
नहीं आएगा बीता वर्ष दोबारा
इस महायज्ञ में होने शामिल
फिर भी हर आगत को नूतन गढ़ना है
यदि विकास के सोपान पर चढ़ना है
और अंतर में गहरे बढ़ना है
नया अंदाज हो बात को कहने का
सीखें गुर दरिया सा सदा बहने का !


बुधवार, मार्च 28

एक नगमा जिन्दगी का


एक नगमा जिन्दगी का


एक दरिया या समन्दर
बह रहा जो प्रीत बनकर,
बाँध मत बाँधें तटों पर
उमग जाये छलछलाकर !

एक प्यारी सी हँसी भी
कैद है जो कन्दरा में,
कसमसाती खुदबुदाती
बिखर जाएगी जहाँ में !

एक नगमा जिन्दगी का
शायराना इक फसाना,
दिलोबगिया में दबा जो
बीज महके बन तराना !

एक जागी रात आये
ख्वाब नयनों में सजाये,
दूर से आती सदा को
ला निकट कुहु गीत गाये !

एक नर्तन आत्मा का
ढोल की थापें अनूठी,
बाल दे अनुपम उजाला
बाँसुरी, वीणा की ज्योति

शनिवार, जनवरी 21

जल रहा है किन्तु जीवन

जल रहा है  किन्तु जीवन

मीठे पानी का इक दरिया 
निकट ही बस बह रहा है 
 एक कदम ही और चलो 
 मरुस्थल यह कह रहा है 
अनसुनी कर बात उसकी 
फुसफुसाहट थी जरा सी 
रहे जलते और बिंधते 
भनक भी न पायी जल की...
दूर से  लहरों की हलचल 
मंद  झोंका कोई शीतल
स्वप्न में ही थी दी सुनायी
निर्झरों की मधुर कलकल 
जल रहा है  किन्तु जीवन
सूख प्यासा हृदय उपवन 
बिन बात ही कंप जाती है 
 संग श्वास यह दिल की धड़कन 
ज्यों पहेली एक उलझी  
मिला हुआ भी खोया लगता 
नींद जिसकी गुम हुई है 
जागते सोया ही रहता 






शुक्रवार, सितंबर 19

यायावर का गीत

यायावर का गीत


जग चलता है अपनी राह
उसने लीक छोड़ दी है,
है मंजूर अकेले रहना
हर जंजीर तोड़ दी है !

सदियों घुट-घुट जीता आया
माया के बंधन में बंधकर,
अब न दाल गलेगी उसकी
रार ठनेगी उससे जमकर !

कितनी सीमायें बांधी थी 
जब पहचान नहीं थी निज से,
कितने भय पाले थे उर में
जब अंजान रहा था उस से !

कैसे कोई रोके उसको
दरिया जो निकला है घर से,
सागर ही उसकी मंजिल अब
बाँध न कोई भी गति रोके !

बुधवार, नवंबर 27

उसकी यात्रा

उसकी यात्रा



फिर लौट आया है मन  
बियाबान जंगलों में बसे गाँव में
जहाँ आबादी के नाम पर
विचारों के झुंड हैं
ऊंचे दरख्तों को चूमते
पर्वतों पर चढ़ते
 आस-पास को छूते हुए चलते
कुछ हसीन विचार.. कुछ गमगीन विचार भी
जहाँ प्रातः होते ही सूर्य उगता है
 देख सकता है मन
सात तालों से बंद कमरे में भी
सूरज की लालिमा
बादलों के बदलते रंग
 जहाँ रोज रात को चाँद निकलता है
 झरनों, नदियों, नालों पर किरणों की अठखेलियाँ
देख सकता है
रेड स्क्वायर के चारों ओर लिपटी धूप में
पंछियों को भी
सोचें जितनी हसीन होती हैं
जीना उतना ही आसान
आस-पास की कड़वाहट
छू भी नहीं पाती
जब मन मीठे दरिया के समीप होता है
कभी घनी अँधेरी गुफा में भटकता
 कभी सीमा पार कर जाता
कभी किसी गहरे समुंदर को पार करता
 कभी दूर आकाश से उतरते
पैराशूट के सहारे
हिचकोले खाता
 कभी नक्सलवादी बन न्याय मांगता
आतंक जगाता मन !

शनिवार, फ़रवरी 9

उसी घड़ी में कुछ घट जाता


उसी घड़ी में कुछ घट जाता 



वक्त का दरिया बहता जाता
यूँ लगता कुछ कहता जाता !

कल का सूरज कहाँ खो गया
आयेगा जो किधर से आये,
अभी अभी था अभी हुआ मृत
किसी अतल में गुमता जाता !

दूर सितारों से गर देखें
धरा गेंद सी डोल रही है,
एक आवरण में लिपटी सी
भेद किसी के खोल रही है !

सब कुछ पल में थिर हो जैसे
समय की रेखायें मिट जाये,
एक सनातन सृष्टि मिलती
क्षण भर को गतियाँ थम जाएँ !

उसी घड़ी में कुछ घट जाता
वक्त का दरिया रुक मुस्काता !