सोमवार, जून 19

चम्पा सा खिल जाने दो मन



चम्पा सा खिल जाने दो मन

उठो, उठो अब बहुत सो लिये
सुख स्वप्नों में बहुत खो लिये
दुःख दारुण पर अति रो लिये
वसन अश्रु से  बहुत धो लिये

उठो करवटें लेना छोड़ो
दोष भाग्य को देना छोड़ो
नाव किनारे खेना छोड़ो
दिवा स्वप्न को सेना छोड़ो

जागो दिन चढ़ने को आया
श्रम सूरज बढ़ने को आया
नई राह गढ़ने को आया
देव तुम्हें पढ़ने को आया

होने आये जो हो जाओ
अब न स्वयं  से नजर चुराओ
बल भीतर है बहुत जगाओ
झूठ-मूठ मत  देर लगाओ

नदिया सा बह जाने दो मन
हो वाष्पित उड़ जाने दो मन
चम्पा सा खिल जाने दो मन
लहर लहर लहराने दो मन

10 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २० जून २०२३ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. नदिया सा बह जाने दो मन
    हो वाष्पित उड़ जाने दो मन
    चम्पा सा खिल जाने दो मन
    लहर लहर लहराने दो मन

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  3. बहुत सुन्दर !
    उठ जाग मुसाफ़िर, भोर भई, अब रैन कहाँ, जो सोवत है !

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  4. आपकी सुंदर,सकारात्मक रचना का संदेश मन तक पहुँच रहा है अनीता जी।
    सादर।

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  5. मन को जागृत करती लाजवाब रचना
    वाह!!!

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