मंगलवार, अगस्त 8

सत्य

सत्य 


सत्य को छोड़कर हम चैन से जी नहीं सकते 

असत्य कितना भी मोहक हो 

विष में बदल जायेगा 

यह जानते हुए उसे पी नहीं सकते 

हिंसा असत्य से उपजी है 

हिंसा अक्षम्य है 

जीवन की माँग है सत्य 

वह वहीं पनपता है 

जहां सामंजस्य हो विपरीत ध्रुवों  में

जहां अलगाव नहीं 

मेल की चाह हो 

जहां बेहोशी जीने का ढंग न बन जाये 

शुतुरमुर्गीय चलन 

न अपना लिया जाये 

हर संकट को देख 

जहां हर उस राह पर 

चलने की तैयारी हो 

जो शांति में नये विश्वास को जन्म दे 

जो जड़ों तक जाकर समाधान सुझाये 

क्योंकि सत्य को छोड़कर 

हम चैन से जी नहीं सकते !

शुक्रवार, अगस्त 4

ख़ुद को ही

ख़ुद को ही 


कोई ओट दे देगा 

उढ़का देगा बाती 

या तेल भर देगा दीपक में 

पर जलना तो ख़ुद को ही पड़ता है !

 

कोई मार्ग दिखा देगा 

लक्ष्य की पहचान दे देगा 

या पाथेय भी दे देगा 

पर चलना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


कोई और नहीं उठा सकता 

किसी के काँधे का बोझ 

न ही उतार सकता है 

क्योंकि गहन है कर्म की गति 

अदृश्य है वह भार 

स्वयं ही उतारना है 

हल्का होना है 

क्योंकि उड़ना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


कोई पता बता देगा घर का 

यदि भूल गया है मन 

भटकते हुए इस चक्रव्यूह  में 

उसकी याद दिला देगा 

पर मुड़ना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


मंगलवार, अगस्त 1

तुम्हारे बारे में


नाटक- तुम्हारे बारे में

लेखक व निर्देशक- मानव कौल


जीवन आने अनेक रूपों में हमारे सम्मुख आता है। हर दिन कुछ न कुछ नया अनुभव दे जाता है। प्रतिदिन समाज में कुछ न कुछ अच्छा या बुरा घट जाता है, जो अख़बार के पहले पन्ने की खबर बन जाता है। हमारी दृष्टि जहाँ जाकर ठहरती है, जीवन हमारे लिये उसके द्वार खोल देता है। एक लेखक को मिलने-जुलने वाले लोगों में कई कहानियाँ नज़र आती हैं, एक वैद्य या चिकित्सक की नज़र उनमें किसी न किसी तत्व की कमी भाँप लेती है। बच्चों को आइसक्रीम और चॉकलेट में आनंद मिल जाता है तो किसी भक्त को दूर से आती भजन की एक पंक्ति भी सुकून से भर जाती है। जब इतनी विचित्रता है यहाँ तो आश्चर्य होता है कि कैसे कुछ लोग जीवन से ऊब जाते हैं, बोर हो जाते हैं, या उदासी मिटाने के लिए नशे या ड्रग्स का सहारा लेने लगते हैं। जीवन इतना रसपूर्ण पहले से ही है और संगीत, साहित्य, नाटक तथा अन्य  विभिन्न कलाएँ इसमें चार चाँद लगा देती हैं। वरिष्ठ साहित्यकार व कलाकार अपने में इतने सघन होते जाते हैं कि सारे जग का दर्द मिटाने की भावना उन्हें चैन से बैठने नहीं देती। उनका अपना स्वार्थ नहीं होता फिर भी कुछ लोग समाज के लिए दिन-रात प्रयत्न करते हैं। ऐसे ही लोगों के बल पर यह दुनिया और खूबसूरत बन जाती है। वे थके हारे लोगों के दर्द  भी महसूस करते हैं और महिलाओं की पीड़ा को भी शब्द देते हैं।


मानव कौल एक ऐसा ही नाम ही है, उनका लिखा व निर्देशित किया नाटक ‘तुम्हारे बारे में’ देखना एक सुखद अनुभव था। यह एक प्रायोगिक नाटक है, जिसमें हास्य और व्यंग्य भी है और असफल रिश्तों के पीछे छिपी हुई पीड़ा का दंश भी। छह पात्रों द्वारा अभिनीत किया यह नाटक समाज में आज के समय में स्त्री-पुरुष संबंधों में आते हुए बदलावों के बारे में बात करता है। यहाँ दिखाया गया है कि आज स्त्रियाँ रिश्तों में पहले की सी सुरक्षा व स्थिरता पाने के लिए घर में बँधना नहीं चाहतीं। वे स्वतंत्रता का अनुभव करने के लिए आकाश में उड़ना चाहती हैं; जबकि पुरुष पात्र पेंग्विन बनना चाहते हैं, अर्थात उनके पास पंख तो हों पर उनसे उड़ा न जा सके। नाटक में तीन महिला और तीन पुरुष पात्र हैं, एक जोड़ा सात वर्ष बाद मिला है और उन कारणों को ज्ञात करना चाहता है जिनकी वजह से वे अलग हुए थे। एक जोड़े की आमने-सामने यह पहली मुलाक़ात है, सोशल मीडिया पर वे मिल चुके हैं और तीसरा जोड़ा अलग होने की कगार पर आ चुका है। किसी कैफ़े में वे मिल रहे हैं और ठंडी व गरम काफ़ी को पसंद करने के प्रतीक से समय के साथ पात्रों में आये बदलावों को चिन्हित किया गया है। कैफ़े में पूरे फ़र्श पर कविताओं के पन्ने बिखरे हुए हैं, जिन्हें पढ़कर महिलाएँ उड़ने की कला सीखना चाहती हैं; शायद लेखक कहना चाहता है, बंधनों से भरे जीवन में कविता ही हमें मुक्ति का अहसास दे सकती है। बीच-बीच में टैगोर का एक मधुर गीत बजता है जो रिश्तों में आयी टूटन के इस दर्द को और गहराई देता है। एक दृश्य में दिखाया है कि मोबाइल का बढ़ता हुआ प्रयोग कैसे व्यक्ति को आत्म केंद्रित कर रहा है।कहीं न कहीं एक-दूसरे के प्रति एकनिष्ठता की कमी तथा उसके कारण पनपा अपराध बोध रिश्तों के बिखरने का मुख्य कारण है। 




सोमवार, जुलाई 31

खुले न द्वार हृदय का जब तक

खुले न द्वार हृदय  का जब तक 


जीवन चिर बसंत सा मिलता 

यदि  कोई बाधा मत डाले, 

सुरभित ब्रह्मकमल सा खिलता 

आत्ममुग्धता ग़र तज डाले !


दिग दिगंत में जो फैला है 

छोटा सा बन हुआ संकुचित, 

खुले न द्वार हृदय  का जब तक 

कैसे मिलन घटेगा समुचित !


 रूप धरा वामन, विराट है

छा जाता भू-स्वर्ग हर कहीं, 

मिट जाये जो पा लेता है 

 नहीं जानता उर राज यही !


जो पहले था, सदा  रहेगा 

उसका स्वाद जरा लग जाये, 

दिल दीवाना रहे ठगा सा 

बार-बार मिट रहे रिझाये !


शनिवार, जुलाई 29

मन का कैनवास

मन का कैनवास 


सिकुड़ जाता है मन का चोला 

तो घुटने लगती हैं श्वासें 

और जन्म होता है हिंसा का 

शायद आत्मरक्षा में 

मन घायल करता है 

पहले स्वयं को 

फिर अपनों को 

यदि शांत न हो पीड़ा तो 

समाज और  

संसार को, 

युद्धों का जन्म ऐसे ही होता है 

सिकुड़ी संकुचित चेतना का परिणाम है क्रोध !

जब फैल जाता है मन का कैनवास 

जिसमें समा जाते हैं धरती और आकाश 

अपने-पराये सब हो अनुकूल 

प्राणी, पशु, पौधे, चट्टान, फूल 

तो प्रेम का जन्म होता है 

प्रेम मुक्त करता है 

सहलाता है 

भर जाता है आनंद से 

सारी कायनात को 

तो किसको चुनेंगे 

संकुचन या विस्तार 

हिंसा या प्यार ! 


मंगलवार, जुलाई 25

पुरनम सी यह हवा


पुरनम सी यह हवा


तेरा पता मिला है औरों से क्या मिलें

पहुँचेंगे तेरे दर अरमान ये खिलें


तुझे छू के आ रही पुरनम सी यह हवा

सब को मेरी दुआ से मिलने लगी शफा


जब से यह बाँधा बंधन थम सा कुछ गया 

माटी का तन तपाया कंचन ह्रदय हुआ 


 दुनिया का सच आखिर आ गया है सम्मुख

फानी है सब जहाँ सुख या कि कोई दुःख


दिल यह मिला है ख़ुद से जब से मिले नयन

पहले पहल थी चिनगी भभकी हुई सघन


जलते हुए जगत में शीतल किया है मन

कैसी अनोखी ज्वाला बुझने लगी तपन


शनिवार, जुलाई 22

ऐसा एक मिलन था अद्भुत


ऐसा एक मिलन था अद्भुत

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,

बरसों पहले घर में परिवार के सभी लोग इक्कट्ठे हुए, जब एक कुनबा एक साथ होता है तो कई नई यादें मनों में घर कर लेती हैं भविष्य में आने वाली पीढ़ियों तक वह यादें किसी न किसी तरह पहुँच जाती हैं. कुछ यादें मैंने इस कविता में उतारी थीं, इसे पढ़कर शायद आपको भी अपने परिवार के मिलन की कोई  स्मृति हो आये...

कई बरस के बाद मिले थे

ह्रदय सभी के बहुत खिले थे,

इक छत के नीचे वे चौदह

चले बातों के सिलसिले थे !


दिवस सुहाने, माह नवम्बर

न ही गर्मी न सर्दी का डर,

कारण पापा की बीमारी

लेकिन खुश वे, उन्हें देखकर !


वाराणसी से डिब्रूगढ़ का

राजधानी में सफर चला,

मुम्बई से उड़े विमान में

फिर असम भूमि का दर्श मिला !


सँग लाए वे भेटें अनुपम

मिठाई का पूरा भंडार,

दीवाली के बाद मिले थे

मीठा मीठा करें व्यवहार !


मलाई गिलौरी, गोंद-पाक 

बूंदी चूर, बरफ़ी अनगिन

मेवों, सेव से बने व्यंजन

खाए मिलजुल सबने हरदिन !


वजन बढ़ा या घटा औंस भर

नापा करते बारी बारी,

अभी नाश्ता समाप्त हुआ न

दोपहरी की हो तैयारी !


फिर बारी भ्रमण  की आती

दो वाहनों  में सभी समाते,

रोज नापते असम की धरती

चाय बागानों में जाते !


नदी किनारे, पुल के ऊपर

पार्क के झूले मन मोहते

पंछी, धूप, हवा, पानी सँग

हरी घास पर सभी झूमते !


ओ सी एस में इक अजूबा

पानी में थी लपट अग्नि की,

देख सभी रह गए अचम्भित

साँसें  सबकी रह गयी रुकीं !


बच्चों ने भी लीं तस्वीरें

मन में यादें भरीं सुनहरी,

दो सौ तेरह में सोये सब

दो सौ सात में की दुपहरी !


मिलकर उनो व कैरम खेला

झूले में भी पींग बढाई,

पौधों को नहलाया जल से

ग्रुप में फोटो खूब खिचाई !


मोनोपली का खेला खेल  

 सभी थे हाज़िर फेसबुक पर  ,

एक जगत जो यह दिखता है 

​​दूसरा आभासी  स्क्रीन  पर  I


मेलजोल से हर दिन बीता

खुशियाँ जैसे झलक रहीं थीं,

योग, प्राणायाम के बल पे

सेहत सबकी ठीक रही थी !


ऐसा एक मिलन था अद्भुत

कविता में जो व्यक्त हुआ है ,

सभी दिलों में जो अंकित है

बड़े प्रेम से खुदा हुआ है !


इसी तरह का प्यार सदा ही

सबके मन में बसा रहेगा 

पापा-माँ की मिलें दुआएं

जीवन सुंदर सदा रहेगा  !!





शुक्रवार, जुलाई 21

अक्सर


अक्सर 


हम जिससे बचना चाहते हैं 

बच ही जाते हैं

जैसे कि कर्त्तव्य पथ की दुश्वारियों से 

अपने हिस्से के योगदान से 

कुछ भी न करके 

हम पाना चाहते हैं सब कुछ 

जगत जलता रहे 

हम सुरक्षित हैं 

जब तक आँच की तपन 

हमें झुलसाने नहीं लगती 

हम हिलते ही नहीं 

अकर्मण्यता की ऐसी ज़ंजीरों ने जकड़ लिया है 

कभी भय, कभी असमर्थता की आड़ में 

हम छुप जाते हैं 

छुपना पलायन है 

पर कृष्ण अर्जुन को भागने नहीं देते 

हर आत्मा को लड़ना ही पड़ता है

एक युद्ध 

प्रमाद के विरुद्ध 

यदि उसे पाना है अनंत 

ऊपर उठना होगा अपनी अक्षमताओं से 

प्रेम को ढाल नहीं कवच बनाकर 

उतरना होगा 

कर्त्तव्य पथ पर !  


बुधवार, जुलाई 19

आत्मा का फूल


आत्मा का फूल 

जहां प्रमाद है वहाँ अहंकार है 

जहां अहंकार है वहाँ प्यार नहीं 

जहां प्यार नहीं वहाँ राग-द्वेष है 

अर्थात वे दो असुर 

जिन्होंने देवों का धरा वेश है 

राग प्रिय से बाँधता है 

द्वेष अप्रिय से बचना चाहता है 

पर हर बंधन दुःखदायी है 

और बचने की कामना ही 

और जोरों से बाँधती आयी है

जिसे पकड़ा है 

वह छूट जाता है 

जिसे छोड़ना चाहा 

वह बना रहता है मन में 

इन असुरों का अंत किए बिना 

प्रेम का राज्य नहीं मिलता 

और प्रेम के बिना 

आत्मा का फूल नहीं खिलता !  



सोमवार, जुलाई 17

एक बांसुरी की सरगम दिल

एक बांसुरी की सरगम दिल 


बस कशमकश है ज़िंदगी, या 

प्रीत रागिनी मधुर बज रही, 

क्यों इसको संघर्ष बनाते 

निशदिन रस की धार बह रही !


सुरमई साँझ, केसरिया दिन 

लपटों में घिर-घिर जाते क्यों, 

एक बांसुरी की सरगम दिल 

व्यर्थ शोर में बदल रहा ज्यों !


प्रेम गुज़ारिश, एक बंदगी 

फ़रमानों की भेंट चढ़ गया, 

जहां सरसता उग सकती थी 

अरमानों का रक्त बह गया !


चंद खनकते सिक्कों आगे 

दिल का दर्द न पड़ा दिखायी, 

अहंकार की भाषा जीती 

सदा प्रीत की ही रुसवाई !


लेकिन आख़िर कब तक बोलो 

जीवन दुर्दम बोझ सहेगा, 

तोड़ बंधनों की सीमाएँ 

नव अंकुर सा उमग बहेगा !