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शुक्रवार, मार्च 7

इतना ही तो कृत्य शेष है

इतना ही तो कृत्य शेष है


‘मैं’ बनकर जो मुझमें बसता 

‘तू’ बनकर तुझमें वह सजता, 

मेघा बन नभ में रहता जो, 

धारा बन नदिया में बहता !


चुन शब्दों को गीत बनाना 

अपनी धुन में उसे बिठाना, 

इतना ही तो कृत्य शेष है 

सुनना तुमको और सुनाना !


अब न कोई सीमा रोके 

नील गगन में किया ठिकाना, 

खुला द्वार, है खुला झरोखा 

सहज हो रहा आना जाना !


शनिवार, दिसंबर 23

मेघा ढूँढें आसमान को

मेघा ढूँढें आसमान को 


मंज़िल पर ही बैठ पूछता 

और कहाँ ? कितना जाना है ?

क्यों न कहें उर को दीवाना 

अब तक भेद नहीं जाना है !


सागर में रहकर ज्यों लहरें 

घर का पता पूछती मिलतीं,

मेघा ढूँढें आसमान को 

घोर घटाएँ नीर खोजतीं !


लिए प्रेम का एक सरोवर 

प्यासा उर प्यासा रह जाता, 

पनघट तीर खड़ा है राही 

इधर-उधर तक टोह लगाता !


भीतर एक आँख जगती है 

कोई साथ चला करता है, 

देख न पाये चाहे उसको 

योग-क्षेम धारण करता है !


आराध्य बना लेगा अंतर 

मस्तक जिस दिन झुक जाएगा, 

गीत समर्पण के फूटेंगे  

प्राणों में बसंत छायेगा !


सोमवार, जून 18

एक रागिनी है मस्ती की


एक रागिनी है मस्ती की

एक ही धुन बजती धड़कन में
एक ही राग बसा कण-कण में,
एक ही मंजिल, एक ही रस्ता
एक ही प्यास शेष जीवन में !

एक ही धुन वह निज हस्ती की
एक रागिनी है मस्ती की,
एक पुकार सुनाई देती
दूर पर्वतों की बस्ती की !

मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया
पंछी जैसे उड़ते गाते,
उड़ते मेघा सँग हवा के
बेसुध छौने दौड़ लगाते !

खुले हों जैसे नीलगगन है
उड़ती जैसे मुक्त पवन है,
क्यों दीवारों में कैद रहे मन
परम प्रीत की लगी लगन है !

एक अजब सा खेल चल रहा
लुकाछिपी है खुद की खुद से,
स्वयं ही कहता ढूंढो मुझको
स्वयं ही बंध कर दूर है खुद से !