बुधवार, जुलाई 11

नहीं तो...


नहीं तो...


देह नहीं हो सकता वह
क्योंकि देह उसकी अस्वस्थ है
पर वह पूर्ववत् है
मन भी नहीं क्योंकि मन उसका उदास भी हो सकता है
पर वह खिला रहता है भीतर पूर्ववत्
वह खुद का पता जानने जाता है जब भीतर
एक सन्नाटा ही हाथ आता है
वहाँ कोई नहीं मिलता
कोई नहीं ऐसा जिसे कुछ कहा जा सके
जिसके साथ कुछ किया जा सके....
जो बस है
और जिसके इर्द गिर्द तानाबाना बुना गया है
देह व मन का
जो रहेगा तब भी
जब यह ताना-बना छिन्न भिन्न हो जायेगा
जब मन के कटोरे में देखता है
तो वही मान बैठता है खुद को
कभी देह के पात्र में वही
अभी उसने खुद के दर्पण में खुद को देखा ही नहीं
नहीं तो....



मंगलवार, जुलाई 10

जन्मदिन पर ढेर सारी शुभकामनाएं


यह कविता उन सभी युवाओं को समर्पित है जिनका जन्मदिन आज है और जो घर से दूर हैं.

जन्मदिन पर ढेर सारी शुभकामनाएं

सहज आत्मविश्वास झलकता
ज़ज्बा कुछ कर दिखलाने का,
भीतर-बाहर एक हुआ मन
नहीं भाव है टकराने का !

सुखद प्रेम की अभिव्यक्ति है
खिला-खिला ज्यों कोई कमल, 
एक ऊर्जा सघन है भीतर
व्यक्त हुआ हर भाव अमल ! 

लक्ष्य दिख रहा चंद कदम पर
पथ भी उज्ज्वल है जिसका,
एक अटूट निष्ठा भी मन में
भाग्य साथ दे क्यों न उसका !

निर्भयता की डोर थाम कर
कितने घाव सहे तन पर,
सबल हुआ विश्वासी अंतर
कितने दंश सहे मन पर !

एक ही बाधा है जीवन में
मनमानी न मन कर पाए,
कभी स्वाद कभी मौज का
कर बहाना नहीं चलाए !

खुद को मालिक जान के रहना
मन के न फिर जाल में फंसना,
खुद से ही शक्ति मिलती है
बाहर के भ्रम में न रहना !

जन्मदिवस पर यही कामना
अपनी शक्ति को पहचानो,
निर्भर होना उस पर सीखो
तन को इक मंदिर मानो !

रविवार, जुलाई 8

ओह ! फिर बिजली चली गयी


ओह ! फिर बिजली चली गयी

गूंज रही मधु सम इक कूक
भोर सुहानी, तपती धूप,
जाने किस मस्ती में ड़ूबे
नन्हें शावक, सुंदर रूप !

बिजली-बिजली करता मानव
वे तपती दोपहर में गाते,
सर्दी, गर्मी, हो बहार या
सारे मौसम इनको भाते !

अभी जुड़े हैं शायद उससे
हम बिछड़े हैं जाने कब से,
भीतर कोई स्रोत खो गया
कितना दुर्बल मनुज हो गया !

किस-किस का यह हुआ गुलाम
रहा नहीं मेहनत के काम,
कैसे उसे नचाता है मन
पल-पल करता उसे सलाम !

सादा जीवन, हल्का सा मन
देह भी फूल सी महक उठेगी,
भीतर छिपी आत्मज्योति जो
कण-कण से फिर स्वयं झलकेगी !

शुक्रवार, जुलाई 6

अपनी ही छाया डसती है


अपनी ही छाया डसती है

ज्यों अपनी ही छाया
ढक लेती है सम्मुख मार्ग को
जब चल पड़ते हैं हम
प्रकाश से विमुख होकर !

वैसे ही विचार
भाव से विमुख हुआ यदि  
स्वयं के आग्रहों से होता है ग्रसित
कोई नहीं है अन्य
 कोई भी नहीं
जो हो मित्र होने को उत्सुक
तो शत्रु होने की कौन कहे...?
सब कैद हैं अपनी ही छायाओं में...

हर पल जब
स्वछन्द होता है विचार
बुनियाद रख रहा होता है
एक नए संघर्ष की
जो लड़ा जायेगा भविष्य में
 जिसका भागी होना होगा स्वयं को
और देह को भी भुगतना होगा दंड
जब जब आक्रामक होगा
चाहेगा मान
खोदता ही जायेगा गढ्ढे
जिसमें गिरने ही वाला है भविष्य में
भाव की ओर मुख किया विचार
प्रकाशित होता है
कोई छाया उसके सम्मुख नहीं पड़ती
खो जाता है अनंत की आभा में...

बुधवार, जुलाई 4

अब राज छिपा कब तक रखे


अब राज छिपा कब तक रखे


कब अपना घूंघट खोलेगा
कब हमसे भी तू बोलेगा,
राधा का तू मीरा का भी
कब अपने सँग भी डोलेगा !

अब राज छिपा कब तक रखे
क्यों रस तेरा मन न चखे,
जब तू ही तू ही सभी जगह
इन नयनों को क्यों न दीखे !

अब और नहीं धीरज बंधता
मुँह मोड़ के क्यों है तू हँसता,
अब बहुत हुआ लुकना-छिपना  
तुझ बिन ना अब यह दिल रमता !

जो तू है, सो मैं हूँ, सच है
पर मुझको अपनी खबर कहाँ,
अब तू ही तू दिखता हर सूं
जाती है अपनी नजर जहाँ !

यह कैसा खेल चला आता
तू झलक दिखा छुप जाता है,
पलकों में बंद करूं कैसे
रह-रह कर बस छल जाता है !

मंगलवार, जुलाई 3

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सभी ब्लॉगर साथियों को ढेरों शुभकामनायें



खुद से भी तो मिलना सीखो


सद् गुरु कहते ‘हँसो हँसाओ’
खुद से भी तो मिलना सीखो,
जड़ के पीछे छिपा जो चेतन
उस प्रियतम को हर सूं देखो !

चलती फिरती है यह काया
चंचल मन इत् उत् दौड़ता,
भीतर उगते पुष्प मति के
चिदाकाश में वही कौंधता !

सत्य सदा एक सा रहता
था, है, होगा कभी न मिटता,
दृश्य बदलते पल-पल जग के
मधुर आत्मरस अविरल बहता !

दृष्टा बने जो बने साक्षी
निज आनंद महारस पाता,
राज एक झाँके उस दृग से
पूर्ण हुआ खुद में न समाता !


रविवार, जुलाई 1

खाली मन का कोरा पन्ना


खाली मन का कोरा पन्ना


खाली है मन बिल्कुल खाली
सर-सर जिसमें हवा गुजरती,
कभी अनल बन लपट सुलगती
नहर विमल सलिल की बहती !

मधुर गूंजता कलरव जिसमें
कभी पिघलते मधुरिम सपने,
झरे कभी पराग सुमनों से
स्वप्निल बहे फाग वृक्षों से !

रक्तिम आभा कभी झलकती
शीतल पावन अगन धधकती,
जल जाएँ इक-इक कर रोड़े
सुगम सुनहरी राह उभरती !

बरस-बरस नीले अम्बर से
मेघ तृषा बुझाते भू की,
बूंद-बूंद में लाते अमृत
बादल प्यास मिटाते जी की !

सहज प्रफ्फुलित रेशा-रेशा
खिली-खिली सी धरा सुहानी,
गहराई में तपन छुपी है
उसे सम्भाले शीतल पानी !

खाली मन का कोरा पन्ना
जिस रंग में चाहे रंग डालो,
केसरिया बन जले मशाल
एक क्रांति की लहर उठा दो !


शुक्रवार, जून 29

छू सकते आसमान





छू सकते आसमान 

जो मिला ही हुआ है
नहीं देखते आँख उठाकर भी
उसकी ओर..
बिछड़ने ही वाला है जो
 थामना चाहते हैं उसे
जो है, अस्वीकार करने में उसे
नहीं लगती पल भर की भी देर...
जो हो नहीं सकते
दौड़ लगाते हैं उसकी ओर...

 विद्यार्थी, बना रहे विद्यार्थी यदि
आत्महत्याएँ हों न शिक्षालयों में
पत्नी हो पाए एक पत्नी
 सीख ले पति, पति होना
बच जाएँ कितने घर गृहयुद्धों से
बच्चे निभाने दें
माँ पिता को अपनी भूमिका
तो प्रेम की एक डोर
बांधे रहे उन्हें आजीवन....

अध्यापक तज देता है अध्यापन
करने के लिये व्यापार
दुरूपयोग करे अधिकारी, अधिकार
बेमन से करे कृषि कर्म कृषक
हर इक गाँव बनना चाहता हो शहर..
हिल जायेगी सारी व्यवस्था
एक नन्हा सा पुर्जा भी मशीन का
 हिल जाये जब
दिख ही जाती है उसकी व्यर्थता

हम जो हैं, रखे गए हैं जहाँ
बेशकीमती है वह स्थान
छूया जा सकता है आकाश
उस स्थान से भी...
नाप सकते हैं सागरों की गहराई
उस स्थान से भी....

पूर्ण है हर कर्म
पूर्ण है हर प्राणी
पूर्ण है हर सम्बन्ध
यदि समझ है पूर्ण इंसान की...  



बुधवार, जून 27

जमीन से जुड़े लोग


जमीन से जुड़े लोग

आपके पावों में अभी
चुभा नहीं है कांटा
दर्द आप कैसे जानेंगे
फूंक फूंक कर पीते हैं वे छाछ भी
दूध के जले हैं, इतना तो मानेंगे....

नहीं लगी आग कभी
आलीशान महलों में आपके
फूस की झोंपड़ी थी, जल गयी
बस कहकर यह, लंबी तानेंगे...

पानी बाढ़ का भला, कैसे
करे हिमाकत
चढ़ने की सीढियाँ, महलों की आपके
गाँव के गाँव डूब गए जिसमें
उस सैलाब को
उड़ के आसमां से जानेंगे...

सुलगती रेत में जले नहीं
तलवे जिनके
क्या जानेंगे वे राज माटी का
बरसती आग में न झुलसे तन
बरसते सावन का मजा
खाक जानेंगे...

बारिशें उड़ा ले गयीं न छप्पर जिनका
कैसे भिगोएँगे भला, बादल उनको
उगाते हैं जमीं से जो सोना
पसीने को उन्हीं के, धोयेंगे बादल

कडकती शीत में न कटकटायीं
हाड़ें जिनकी
तपिश अलाव की, न दे पायेगी सुकून
गल न गयीं बर्फ में
 उंगलियाँ जिसकी
क्या कदर होगी गर्म वस्त्रों की उसे...

मुश्किलों से जो दो चार हुआ करते हैं
वही श्वासों की कीमत अदा करते हैं
जमीन से जुड़े हैं जो लोग यहाँ
वही जगत की जीनत बना करते हैं !




रविवार, जून 24

याद तेरी


याद तेरी

तू प्यार समोए है अनंत
छू जाता पवन झंकोरे में,
कभी लहराती शाखाओं में
कभी झूम रहे इन पत्तों में !

बन सुंदर कीट चमकता है
जुगनू की आभा में छिपता,
कभी कलरव कूकू कोकिल की
कभी हरी दूब में तू हँसता !

सरगोशी सांय सांय की जो
जब पवन सुनाया करती है,
पीपल के पल्लव नाच रहे
बदली छा जाया करती है !

जब सूर्य चमकता है नभ में
मेघों के पार रजत बन के,
जब किरणें तन को छू जातीं
वृक्षों के पत्तों से छन के !

जब कोमल पुष्प की पंखुडियां
झर झर झर जाती हैं यूँही,
तब दिल में तेरी परछाई
इक मौन सी भर जाती यूँही !  

शुक्रवार, जून 22

जाने कब फिर मिलना हो


जाने कब फिर मिलना हो


कुछ तुम कह दो, कुछ हम सुन लें
कलियों का कब खिलना हो
जाने कब फिर मिलना हो !

चंद श्वास लेकर आये थे
कुछ ही शेष रही हैं जिनमें,
कहीं अधूरा न रह जाये
किस्सा, हम तुम मिले थे जिसमें !

तुम झाँकों मेरे नयनों में
फुरसत ऐसी कल ना हो,  
जाने कब फिर मिलना हो !

कितने संगी चले जा चुके
अभिनय करते थके थे शायद,
मंच कभी खाली न हुआ यह
स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

पलकों को न बंद करो तुम
जाने किस पल चलना हो
 जाने कब फिर मिलना हो !

जितना साथ मिला सुंदर था
इक-दूजे में झलक भी पायी,
स्वप्नों में वह छिपी न रहती
जग कहता है जिसे खुदाई !

हाथ थाम लो पल भर को तुम
अधरों का कब सिलना हो
जाने  कब फिर मिलना हो !