सोमवार, अक्टूबर 12

जो खिल रहा अनंत में

 जो खिल रहा अनंत में 

एक ही तो बात है 

एक ही तो राज है, 

एक को ही साधना 

एक से दिल बाँधना !


एक ही आनंद है 

वही जीवन छंद है, 

बह रहा मकरंद है 

मदिर कोई गंध है !


खिले वही अनंत में 

दुःख-विरह के अंत में, 

राधा-श्याम कंत में

ऋतुराजा वसंत में ! 

 

 रहे यदि बंटे हुए 

जीवन से कटे हुए, 

 तीर से बिंधे हुए 

सुख विलग रुंधे हुए !


राज से अनभिज्ञ है 

मूढ़ कोई विज्ञ है, 

एक की हो साधना 

उसी  की  आराधना !


शुक्रवार, अक्टूबर 9

ज्ञान और ज्ञाता

 ज्ञान और ज्ञाता

जो किताबें आज सजी हैं 

पुस्तकालयों की आलमारियों में 

वे कभी रहा करती थीं 

मानव मस्तिष्क में 

जब तक प्रकटी नहीं 

तब भी थीं अस्तित्त्व के गर्भ में 

विद्या माया ने रचाया है सारा आयोजन 

कलाओं, संस्कृतियों का करने संवर्धन 

अनंत ज्ञान छिपा है उसके कोष में 

किन्तु ज्ञाता फिर भी अदृश्य बना रहता है 

शब्द शक्ति है विद्या रूपी 

जानने वाले इसे प्रकट करते हैं 

और स्वयं उसी विराट में मिल जाते है 

कालिदास के शब्द हमें मिलते हैं  

वह स्वयं कहीं विलीन हो गया !


गुरुवार, अक्टूबर 8

प्रार्थना

 प्रार्थना 

जो दिया है तूने हे प्रभु !

असीम है 

नहीं समाता इस झोली में 

तू दिए ही जाता है 

तेरी अनुकम्पा की क्या कोई सीमा है ?

उदार मालिक द्वारा दिए गए अतिरिक्त धन की तरह 

तू भरे जाता है संसार 

मेरा मन झुका है तेरे कदमों में 

बैठा नहीं जाता देर तक 

दुखती है बूढ़ी हड्डियाँ

करवटें बदलते बीतती है रात 

फिर भी जगाता है तू हर प्रभात 

रखता है सिर पर अपना हाथ 

मेरा मन डूब जाता है 

आकाश की तरह विस्तृत उस आनंद में 

जो तू बरसा ही रहा है  

अनवरत ! 


मंगलवार, अक्टूबर 6

मन और वह

मन और वह 

मन  हिरण सा दौड़ता है 

धरती से आकाश तक 

अनभिज्ञ.... कि कोई है ज्योति शिखा सा 

भीतर जलता है, अकंप 

जो उसमें प्राण फूँकता है 

मन बादलों की तरह डोलता है 

चाहता है दूर अंतरिक्ष के पार जाना 

अनभिज्ञ.... कि कोई है पूनो के चाँद सा 

जो उससे ही आवृत रहता है 

देता है संबल

युगों से प्रतीक्षारत  

मौन ! दौड़ कभी तो अर्थहीन होगी 

डोलना कभी तो थमेगा  

गति के पीछे अगति में 

रूप के पीछे अरूप में 

शब्द के पीछे निशब्द में 

सम्भवतः सुख के पीछे आनंद में !

 

सोमवार, अक्टूबर 5

बरसेगा वह बदली बनकर

 बरसेगा वह बदली बनकर 

उर में प्यास लिए राधा की 

कदमों में थिरकन मीरा की, 

अंतर्मन में निरा उत्साह 

उसकी बांह गहो !


जीवन की आकुलता से भर 

प्राणों की व्याकुलता से तर, 

लगन जगाए उर में गहरी 

नित नव गीत रचो !


बाँटो जो भी पास तुम्हारे 

कोई हँसी दबी जो भीतर, 

शैशव की वह तुतलाहट भी 

खिल कर राह भरो !


झर जाने दो पीले पत्ते 

सारे दुःख अपने अंतर से, 

तोड़ श्रृंखला जन्मों की हर 

दिल की बात कहो !


दीप जलाये प्रीत का सुंदर 

पग रखो फिर उसके पथ पर, 

गिर जाने दो हर भय, संशय 

उसकी चाह करो !


अब वह मन्दिर दूर नहीं है 

दूरी या देरी होने पर 

किन्तु न करना रोष जरा भी 

उसकी राह तको !


बरसेगा वह बदली बनकर 

कभी प्रीत की चादर तनकर,

ढक लेगा अस्तित्व् को सारे 

उसके संग रहो !


रविवार, अक्टूबर 4

अस्तित्त्व और हम

 अस्तित्त्व और हम 

एक हवा का झोंका भी आकर 

उसकी खबर दे जाता है 

दूर गगन में उगता हुआ साँझ का तारा 

उसकी याद से भर जाता है 

बादलों में बना कोई आकार

छेड़ जाता है मन की झील को 

डाली पर एक फूल का खिलना 

कैसी मुस्कान अंतर में जगा जाता है 

तेरे मिलने के हजार ढंग हैं !

वर्षा की फुहार बनकर तू ही 

भिगोता है उर का आंगन 

कोयल की कूक में कोई नगमा सुना जाता है 

सूरज की पहली किरण 

छूती है चेहरे को 

लगता है तू ही चुपके से गुलाल लगा जाता है 

झरनों का संगीत या पंछियों का गीत 

ओस की छुवन या घास का परस

देता है तू ही हर रूप में 

हर रंग में हर शै में दरस 

तू ज्योति बनकर दीपक में जलता है 

जिसे देख अंतर में कोई स्वप्न पलता है  

मन भी ज्योति बनकर 

जले तेरी राह में 

कुछ भी न शेष रहे 

शून्य ही बरसे हर चाह में 

अस्तित्त्व के साथ एक हो जाना ही तो पूजा है 

उसके सिवा न साधन कोई दूजा है !


शनिवार, अक्टूबर 3

लुटा रहा वह धार प्रीत की


लुटा रहा वह धार प्रीत की 


 

जीवन के इस महाविटप पर 

दो खग युगों-युगों से बसते, 

एक अविचलित सदा प्रफ्फुलित 

दूजे के पर डोला करते !


लुटा रहा वह धार प्रीत की 

दूजा  फल कटु-मृदु खोज रहा, 

इक है निःशंक निज गरिमा में 

कब दूजे को निज बोध रहा !


उड़ जाता है वह दूर दूर 

संघर्षों का अनुयायी है, 

नव नीड़ रचे ढूंढ प्रियजन 

अकुलाहट हिस्से आयी है !


फिर इक दिन तो ऐसा होगा 

बल कोई न पाँखों में रहा, 

नजरें फिर मोड़ उसे देखे 

जो सदा प्रतीक्षित था तकता !


वह घड़ी अनूठी ही होगी 

जब मिलन सुहृद से घट जाये, 

विमल असीम स्नेह से पूरित 

दो पंछी एक हुए गायें !




शुक्रवार, अक्टूबर 2

गाँधी बाबा

गाँधी बाबा

तुम्हारा जीवन ही तुम्हारा संदेश है


‘सत्य ही ईश्वर है’ से ‘ईश्वर सत्य है’ की  तुम्हारी यात्रा 

कितनी अनोखी है, अप्रतिम, अनिवर्चनीय 

अहिंसा के पथ पर चलने वाले हे महामानव !

सारी दुनिया बनी वह प्रयोगशाला जिसमें किये तुमने 

न जाने कितने गहन मनन और चिंतन  के बाद 

सत्य के प्रयोग !

सादा जीवन और स्वच्छता में ईश्वर को देखने वाले  

स्वालम्बन का उदाहरण बने स्वयं 

अध्यात्म है भारत की आत्मा मानकर यह तथ्य 

तुमने धर्म को राजनीति से जोड़ा 

साध्य और साधन की पवित्रता को 

एक समान बल दिया 

 संदेश दिया ग्रामीण भारत को 

स्वावलम्बन का 

  पहचान महिला-शक्ति उन्हें स्वतन्त्रता  सेनानी बनाया 

अछूत प्रथा, नशाबन्दी, दिया खादी को बढ़ावा 

बुनियादी शिक्षा में सुधार किया 

अनेकानेक क्षेत्रों में तुमने योगदान दिया 

सभी पन्थों को समान सम्मान देने वाले 

कथनी और करनी में कोई भेद न रहे 

इसका ज्वलन्त उदाहरण तुम स्वयं बने 

दुर्बल काया के भीतर चट्टान सा दृढ जीवट  

और फूल सा कोमल हृदय  

मोह लेती है तुम्हारी बाल सुलभ पोपली मुस्कान 

बापू ! तुमने आदर्शों की जीया 

अनेक बार स्वयं गरल पीया 

भारतीयों के अंतर में नई चिंगारी फूंकी 

आजादी की अलख जगाई 

नमक आंदोलन, सत्याग्रह, भारत छोड़ो 

तुमने अनथक समर लड़ा 

यात्रायें की, अपमान सहा

मोहना से बापू की तुम्हारी यात्रा भी उतनी ही अनुपम है 

तुम्हारे जीवन में 

भारत की आत्मा हुई प्रकट है ! 

गुरुवार, अक्टूबर 1

मिलन अधूरा उसे न भाए

मिलन अधूरा उसे न भाए

जन्मों की मृदु प्रीत पुरानी 

कुछ भूली सी अनजानी कुछ, 

उस प्रियतम को जरा पुकारो  

 दौड़ा आता हर पुकार पर !


निज सुख खातिर चाह उठी तो  

मिलन नहीं वह  केवल  है भ्रम,

अहंकार उर  शेष रहा तो 

कहाँ  रहे वैरागी प्रियतम !


उसे चाहता मन वैसे यदि  

जैसे  जग का हर सुख चाहे, 

वह तो पूरा ही मिलता है 

मिलन अधूरा उसे न भाए !


मन अंतर  चरणों पर अर्पित 

बुद्धि इसी पर होती गर्वित, 

अहंकार भी चढ़ा प्रेम का 

दूरी कभी न होती खंडित !


सब विस्मृत बस सुमिरन उसका 

वही-वही बस रह जाए जब, 

उससे पूरा मिलन घटेगा 

है यही प्रीत का परम सबब !


 

बुधवार, सितंबर 30

दोनों के ही पार मिले वह

दोनों के ही पार मिले वह 


देखे राग-रंग दुनिया के 

मृग मरीचिका ही सब निकले, 

 निकट जरा जा  छूकर देखा 

जैसे इंद्रधनुष हो नभ में !


पीड़ाओं के बीज गिराए 

अनजाने या कभी जानकर, 

जिस पथ की मंजिल धूमिल है 

थके नहीं पग उसे नापकर !


हर मुस्कान छिपाए है कुछ 

भीतर कुछ है बाहर है कुछ,

दोनों के ही पार मिले वह 

कर देता हर सुख-दुख ना कुछ !  


 मिलना होगा महाकाल से 

केवल  बात यही है निश्चित,

शेष सभी स्वप्नों सा मिथ्या 

जग में जो भी मिलता सीमित  !

 

मंगलवार, सितंबर 29

नाचती इक ऊर्जा ही

नाचती इक ऊर्जा ही 


नित नवीन निपट अछूती

इक मनोहरी ज्योत्स्ना है,

सुन सको तो सुनो उसकी 

आहट ! यह न  कल्पना है !


गूँज कोई नाद अभिनव 

हर शिरा में बह रहा है,

वह अदेखा, जानता सब 

न जाने क्या कह रहा है !


आँख मूँदे श्रवण रोके 

झाँक अंतर मन टटोलो, 

ज्योति की इक धार बहती 

हृदय की हर गाँठ खोलो !


नाचती इक ऊर्जा ही 

प्राण बनकर संचरित है, 

जानती सब पर अजानी

पुष्प बन कर उल्लसित है !

 

सोमवार, सितंबर 28

पंख पसार उड़े क्षितिजों तक

 पंख पसार उड़े क्षितिजों तक 

एक जागरण ऐसा भी हो 

खो जाए जब अंतिम तन्द्रा, 

रेशा-रेशा नाचे ऊर्जित 

मिटे युगों की भ्रामक निद्रा !


मन जो सिकुड़ा-सिकुड़ा सा था 

पंख पसार उड़े क्षितिजों तक, 

सारी कायनात भरने फिर 

बाहें फैलें नीलगगन तक !


दूजा नहीं दिखाई देता 

संग पवन के चले डोलते,

चहूँ ओर वसन्त छाया हो 

नयन प्रेम के राज खोलते !


संशय, भ्रम, भय जलें अग्नि में 

अनहद घन मंजीरे बजते,

मानस भू पर बहे प्रीत रस 

थिरकें झूमें पुष्प ख़ुशी के !


एक जागरण ऐसा भी हो 

फिर न कभी मदहोशी घेरे, 

नहीं सताए कोई अभाव 

पलकों में ना स्वप्न अधूरे !


शुक्रवार, सितंबर 25

भोर में कोई जगाये

 भोर में कोई जगाये 

चैन नींदों में समाए 

स्वर्ग स्वप्नों में दिखाए,

भोर में कोई जगाये 

बस यही तुम मांग लेना ! 


बैन में मधुरा भरी हो 

नैन सूरत साँवरी हो, 

जगत की पीड़ा हरी हो 

बस यही आशीष लेना !


पग कभी रुकने न पाएँ

हाथ अनथक श्रम उठायें, 

अधर पल-पल मुस्कुराएं 

बस यही वरदान लेना !


रिक्त हो उर चाह से अब

सिक्त हो रस रास से जब,  

पूर्णता का भास हो तब 

बस यही सुख जान लेना !


श्वासों में भी कंप न हो 

देह-हृदय में द्वंद्व न हो, 

सुरताली स्वच्छंद न हो 

बस यही संकल्प लेना !