सोमवार, जुलाई 1

पिता की स्मृति में


पिता की स्मृति में


एक आश्रय स्थल होता है पिता
बरगद का वृक्ष ज्यों विशाल
नहीं रह सके माँ के बिना
या नहीं रह सकीं वे बिना आपके
सो चले गये उसी राह
छोड़ सभी को उनके हाल....

पूर्ण हुई एक जीवन यात्रा
अथवा शुरू हुआ नवजीवन
भर गया है स्मृतियों से
मन का आंगन
सभी लगाये हैं होड़ आगे आने की
लालायित, उपस्थिति अपनी जताने की
उजाला बन कर जो पथ पर
चलेंगी साथ हमारे
बगीचे से फूल चुनते
सर्दियों की धूप में घंटों
अख़बार पढ़ते
नैनी के बच्चे को खिलाते
मंगलवार को पूजा की तैयारी करते
जाने कितने पल आपने संवारे....

विदा किया है भरे मन से
काया अशक्त हो चुकी थी
पीड़ा बनी थी साथी
सो जाना ही था पंछी को
 छोड़कर यह टूटा फूटा बसेरा
नये नीड़ की तलाश में

जहाँ मिलेगा एक नया सवेरा... 

(पिछले माह १८ जून को ससुर जी ने देह त्याग दिया, काशी में उनको अंतिम विदाई देकर आज ही हम लौटे हैं)

शुक्रवार, जून 14

सुख उपहार जागरण का है

सुख उपहार जागरण का है



सुख की चादर के पीछे ही
छुपे हुए हैं कंटक दुःख के, 
लोभ किया आटे का जब-जब
फंस जाती मछली कांटे में !

स्वर्ग दिखाता, आस बंधाता
भरमाता जो अक्सर मन को
जब तक मन आतुर है सुख का
 छल जाता है दुःख जीवन को !

सुख तो ऊपर-ऊपर होता
 भीतर गहरे में इक दुःख है,
नाम इसी का जगत है जिसमें
सुख के नाम पे मिलता दुःख है !

कई रूप धर हमें लुभाता
बहुत मिलेगा सुख, कहता है,
एक बार जब फंस जाता मन
अहम् उसे चुप हो सहता है !

छोटी-छोटी भूलों पर भी
ना खुद को झुकने देता,
एक रेत का भवन खड़ा है
स्वयं ही कैसे गिरने देता !

कैसा माया जाल बिछा है
पीतल स्वर्ण का धोखा देता,
सुख उपहार जागरण का है
जो मंजिल पर ही जाकर होता !


मंगलवार, जून 11

आयी है घर में बहार

आयी है घर में बहार

बात पिछली शताब्दी की है
तब इंटरनेट भी नहीं था न मोबाईल
सुबह सवेरे बैठ कर रिक्शे पर
जाती थी छोटी सी बालिका स्कूल
लगाये बालों में रिबन के फूल

फिर बात कुछ वर्ष बाद की...
पहने छोटी सी सलवार-कमीज
समुद्र-टापू खेलते आंगन में
नहीं जाना आज स्कूल..
खेलने दो न, जिद करती माँ से
चली गयी थी फिर विदेश
कहाँ हुई फ़ोन से भी फिर बात  
अब तस्वीरों से ही होती थी मुलाकात
वर्षों बाद एक बार आई थी हमारे साथ
कालेज शुरू करने से पूर्व
फिर की लम्बी पढ़ाई
विवाह बंधन में बंधी
सीए युगल ने दुबई में रह 
सफलता व सम्पन्नता पायी

वापस आकर राजधानी में
सुघड़ गृहस्थी जमाई
बने है वे माँ-पिता  
आज खबर है आयी
गौरव जान चुकी है आज नारी होने का
किसी की तुतलाती बोली में माँ कहलाने का
धरा पर लायी है एक किलकार
देने उसे प्यार और ढेर सारे संस्कार
हर्षित है सारा परिवार
आयी है घर में बहार
हाँ, वह दर्द में है अभी  
पर यही पीड़ा
जीवन का सम्बल बनेगी
भीतर की शक्ति जगेगी  
मिले प्यारी गुडिया को
जीवन के सभी प्राप्तव्य
सुंदर हो भविष्य
और हों कर्म दिव्य
यही है हमारी कामना
नये-नये माँ-पापा के लिए दिली शुभ भावना..




शुक्रवार, जून 7

एक रास्ता है मन

एक रास्ता है मन

मन मानो भूमि का एक टुकड़ा है
उगाने हैं जहाँ उपवन फूलों भरे
जहाँ बिन उगाये उग आते हैं
खर-पतवार
हो सकता है अनजाने में गिराए हों बीज उनके भी
समय की अंतहीन धारा में  
जिस पर पनपे-उजड़े अनंत बार
कितने पादप कितने वृक्ष
पर अब जब कि पता चल गया है
पता उस खुशबू का
जिसकी जड़ छिपी है मन की ही माटी में कहीं गहरे
तो उपवन सजाना है
उसी को खिलाना है

मन मानो एक मदारी है
जब तक हम उसकी हरकतों पर बजाते हैं तालियाँ
तब तक दिखाता रहता है वह खेल
जिसे मिटाना ही है
उसे बड़ा क्यों करना
जिससे मुक्त होना ही है
उससे मोह क्यों लगाना
जिससे गुजरना भर है
क्यों बनाना उस पथ पर घर
एक रास्ता है मन
जो पार करना है
जब खो जाते हैं सारे अनुभव
तब कोई देखने वाला भी नहीं बचता
नाटक बंद होते ही
घर लौटना होगा
घर आना ही होगा हरेक को
एक यात्रा है मन
जो घर तक ले जाएगी....

मंगलवार, जून 4

नये घर में

नये घर में


हरा-भरा विशाल बगीचा
बिछा है जिसमें कोमल घास का गलीचा
सलेटी आकाश से गिरता अमृत सा जल
भिगो रहा है कण-कण धरा का
बरामदे की छत पर घूमते पंखे की हवा में
झूमते गमलों के पात
बाहर भीगते हैं फूलों-पौधों के गात
नये घर में थी कल हमारी दूसरी रात
सामने है मेजेंटा बोगेनविलिया
बायीं ओर गुलमोहर
श्वेत पंखुड़ियों के मध्य पीली लिए
सुवासित फूलों का पेड़ दूर हेज को छूता हुआ
दायीं ओर ‘ब्लीडिंग हार्ट’ के रक्तिम आभा लिए श्वेत पुष्प
‘जीनिया’ की कतारें भी मुस्तैद खड़ी हैं
गुलाब की झाड़ी भी हँसने पर अड़ी है
पंचम सुर में आम पर कोयल है गाती
हरियाली ही हरियाली है दूर तक नजर आती
गेट पर खड़े हैं दोनों तरफ कंचन
मानो हर आगन्तुक का करते हों अभिनन्दन
सुर्ख लाल जवाकुसुम बाहर से नजर आता है
निकट खड़े दुसरे गुलमोहर को भी लजाता है
सडक पार रोज गार्डन के नजर आता है अमलतास
एक सुखद अनुभव है नये घर में निवास
शुरू हो गयी है सडकों पर वाहनों की आवाजाही
भ्रमण पथ पर नजर आ जाता है अक्सर कोई राही..

सोमवार, जून 3

बरसे नभ से मधुरिम सागर

बरसे नभ से मधुरिम सागर


मचल रहा बाहर आने को
ठांठे मारे एक समुन्दर,
आतुर है सुवास अनोखी
चन्दन वन सी अगन सुलगकर !

नदी बह रही ज्योति उर्मि
भीतर सूरज कई छिपे हैं,
एक शहद में भीगी वाणी
मधुर गीत अभी कहाँ कहे हैं !

झरते कोमल कुसुम कुदुम्बी
वैजन्ती माला की झालर,
जगमग हीरा कोई चमकता
बरसे नभ से मधुरिम सागर !

खाली जब अंतर आकाश
ज्योति बही जाती है अविरल
उसी एक की खुशबू फैली
वही करेगा अंतर अविकल !


सोमवार, मई 27

इक दिया, कुछ तेल, बाती


इक दिया, कुछ तेल, बाती



खो गया है कोई घर में चलो उसको ढूँढ़ते हैं
बह रहा जो मन कहीं भी बांध कोई बाँधते हैं

आँधियों की ऊर्जा को पाल में कैसे समेटें  
उन हवाओं से ही जाकर राज इसका पूछते हैं

इक दिया, कुछ तेल, बाती जब तलक ये पास हैं
उन अंधेरों से डरें क्यों खुद जो रस्ता खोजते हैं

हँस दे पल में पल में रोए मन शिशु से कम नहीं
दूर हट के उस नादां की हरकतें हम देखते हैं

कुछ न खुद के पास लेकिन ऐंठ में अव्वल है जो
उस अकड़ को शान से कपड़े बदलते देखते हैं  



शनिवार, मई 25

मन राधा बस उसे पुकारे


मन राधा बस उसे पुकारे


झलक रही नन्हें पादप में
एक चेतना एक ललक,
कहता किस अनाम प्रीतम हित
खिल जाऊँ उडाऊं महक !

पंख तौलते पवन में पाखी
यूँ ही तो नहीं हैं गाते,
जाने किस छुपे साथी को
टी वी टुट् में वे पाते !

चमक रहा चिकना सा पत्थर
मंदिर में गया जो पूजा,
जाने कौन खींच कर लाया
भाव जगे न कोई दूजा !

चला जा रहा एक बटोही
थम कर किसकी ओर निहारे,
गोविन्द राह तके है भीतर
मन राधा बस उसे पुकारे !



मंगलवार, मई 21

स्वयं ही स्वयं को लिखता पाती


स्वयं ही स्वयं को लिखता पाती

जीवन है सौगात अनोखी
माँ का आंचल, पिता का सम्बल,
प्रियतम का सुदृढ़ आश्रय
वात्सल्य का निर्मल सा जल !

गीत भी है, संगीत जहाँ में
दृश्य सुहाने मोहक मंजर,
वर्षा की सोंधी सी खुशबू  
भोर हुए पंछी के मृदु स्वर !

झोली भर-भर मिले खजाने
कुदरत का अनन्य कोष है,
तृप्त हुआ बस डोले इत-उत
अंतर जिसके जगा तोष है !

श्वास-श्वास है नेमत उसकी
अमृत सा जल, सूरज, बादल,
नेह का ताप, प्रीत शीतलता
उमड़-घुमड़ बरसा अश्रुजल !

भाव जगाता, शब्द सुझाता
स्वयं ही स्वयं को लिखता पाती,
कैसी अद्भुत एक ऊर्जा
 अनायास सृष्टि अँक जाती !

सर्व सुखी भव, सर्व निरामय
गीत पुन ऐसे गाने हैं,
बने प्रार्थना धड़कन दिल की
बहें जो मधुर तराने हैं  !

शुक्रवार, मई 17

मृत्यु एक पड़ाव भर है


मृत्यु एक पड़ाव भर है

जन्म के पीछे छिपी है मृत्यु
ज्ञानी तत्क्षण देख रहा है,
नई यात्रा पर जाना है  
मृत्यु एक पड़ाव भर है !

जग यह इक दिन खो जायेगा
धूल में मिल जायेगा सब धन,   
अंधकार में छिपा उजाला
छिपा जरा में है नव यौवन !  

होती जब धौंकनी खाली
शक्ति से फिर भर जाती,
सांसे जब बाहर जाती हैं  
तब ही तो भीतर आतीं !  

हर श्वास पर मरता मानव
हर श्वास जीवन दे देती,
जीकर मरना, मरकर जीना
दो पैरों पर होती है गति !

यहाँ जिंदगी पल-पल देती
खालीपन भी भर जायेगा,
भरा हुआ पर जो पहले से
कैसे वह कुछ भी पायेगा !

हर क्षण जग खिलता-मिटता है
प्रेम में नफरत का पुट होता,
द्वन्द्वों से ही सृष्टि चलन है
सुख मोती दुःख तार पिरोता !